UN में एर्दोआन का कश्मीर दांव उलटा पड़ा, नेतन्याहू ने पलट दिया पूरा खेल

UN में एर्दोआन का कश्मीर दांव उलटा पड़ा, नेतन्याहू ने पलट दिया पूरा खेल

                                                           

अंतरराष्ट्रीय मंच पर दूसरों को कठघरे में खड़ा करना आसान है, लेकिन जब वही मंच आपके अपने रिकॉर्ड का आईना बन जाए, तो सवालों से बचना मुश्किल हो जाता है। एर्दोआन के साथ इस बार कुछ ऐसा ही हुआ। दरअसल न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा का 81वां सत्र कश्मीर और तुर्की को लेकर एक दिलचस्प कूटनीतिक घटनाक्रम का गवाह बना। 22 सितंबर 2026 को तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोआन ने कश्मीर का उल्लेख करते हुए भारत और पाकिस्तान के बीच संवाद की वकालत की। दो दिन बाद इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने इसी मंच से एर्दोआन और तुर्की की नीतियों पर तीखा प्रहार किया। एक ओर एर्दोआन भारत के कश्मीर प्रश्न पर टिप्पणी कर रहे थे, दूसरी ओर नेतन्याहू ने तुर्की की क्षेत्रीय भूमिका और उसकी घरेलू नीतियों को सवालों के घेरे में ला दिया।
 

यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में किसी देश का दूसरे देशों की नीतियों पर सवाल उठाना उसके अपने आचरण को भी चर्चा में ले आता है। कश्मीर पर भारत को सलाह देने वाले तुर्की के सामने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, राजनीतिक विरोध, पत्रकारों की स्थिति, न्यायपालिका और मानवाधिकारों से जुड़े सवाल पहले से मौजूद है। ऐसे में नेतन्याहू का तुर्की पर हमला एर्दोआन की कश्मीर टिप्पणी के समानांतर एक बड़ा कूटनीतिक संदेश लेकर आया, दूसरों की नीतियों पर सवाल उठाने से पहले अपनी नीतियों और अपने रिकॉर्ड का सामना भी करना पड़ता है।


एर्दोआन की इस टिप्पणी को उस समय के व्यापक क्षेत्रीय संदर्भ में भी देखा जा रहा है। उनके वक्तव्य से कुछ सप्ताह पहले तुर्की, पाकिस्तान और सऊदी अरब ने मक्का में संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इसलिए एर्दोआन द्वारा कश्मीर का उल्लेख भारत-पाकिस्तान संबंधों से आगे बढ़कर तुर्की की पश्चिम एशिया तथा दक्षिण एशिया की रणनीतिक सक्रियता के संदर्भ में भी चर्चा का विषय बना। एर्दोआन ने जहां संयुक्त राष्ट्र चार्टर, अंतरराष्ट्रीय कानून और संवाद के आधार पर कश्मीर सहित विवादों के समाधान की बात की, वहीं नेतन्याहू ने तुर्की की अपनी क्षेत्रीय नीतियों और एर्दोआन के वक्तव्यों को कठघरे में खड़ा करने का प्रयास किया।


नेतन्याहू ने एर्दोआन की क्षेत्रीय नीतियों और हमास के प्रति तुर्की के रुख को निशाना बनाया। उनका संदेश यह था कि जो देश अंतरराष्ट्रीय मंच पर दूसरे देशों को मानवाधिकार, अंतरराष्ट्रीय कानून और राजनीतिक समाधान का पाठ पढ़ाते है, उनकी अपनी नीतियों और मानवाधिकार रिकॉर्ड पर भी सवाल उठाए जा सकते है। तुर्की के मानवाधिकार रिकॉर्ड पर अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की गंभीर टिप्पणियां इस बहस को और महत्वपूर्ण बनाती हैं। ह्यूमन राइट्स वॉच की 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में तुर्की में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण सभा, राजनीतिक विपक्ष, मानवाधिकार रक्षकों और न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर गंभीर चिंताएं दर्ज की गईं। रिपोर्ट के अनुसार इस्तांबुल के मेयर एकरेम इमामोग्लू की गिरफ्तारी के बाद विपक्ष के विरुद्ध कार्रवाई तेज हुई और सरकार पर न्यायपालिका तथा राज्य संस्थाओं पर मजबूत नियंत्रण रखने के आरोप लगाए गए। 


अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रश्न भी तुर्की की अंतरराष्ट्रीय छवि को प्रभावित करता है। ह्यूमन राइट्स वॉच के अनुसार पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और सरकार की आलोचना करने वाले लोगों के विरुद्ध मुकदमे तथा गिरफ्तारियां जारी रहीं। 2025 के अंत में 27 पत्रकार और मीडिया कर्मी पूर्व-परीक्षण हिरासत या सजा भुगत रहे थे। सोशल मीडिया पर भी प्रतिबंध और सामग्री हटाने के आदेशों का इस्तेमाल किया गया। 


कुर्द प्रश्न भी तुर्की के मानवाधिकार रिकॉर्ड का महत्वपूर्ण हिस्सा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि कुर्द राजनीतिक कार्यकर्ताओं और नेताओं पर आतंकवाद संबंधी कानूनों के तहत कार्रवाई जारी रही। पूर्व एचडीपी नेताओं सेलाहत्तिन देमिर्ताश और फिगेन युकसेकदाग की लंबे समय से जारी हिरासत भी इसी संदर्भ में उल्लेखित है। 


हिरासत में यातना और दुर्व्यवहार को लेकर भी अंतरराष्ट्रीय चिंता सामने आई है। ह्यूमन राइट्स वॉच ने संयुक्त राष्ट्र की यातना-विरोधी समिति की टिप्पणियों का उल्लेख करते हुए बताया कि तुर्की के हिरासत केंद्रों में यातना और दुर्व्यवहार के आरोप व्यापक स्तर पर सामने आए और समिति ने इस संबंध में सुधारात्मक कदम उठाने की सिफारिश की।   यही वह बिंदु है जहां भारत के दृष्टिकोण से एर्दोआन के कश्मीर बयान पर गंभीर प्रश्न खड़े होते है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में किसी देश का दूसरे देश के मानवाधिकार या क्षेत्रीय विवाद पर प्रश्न उठाना अपने आप में असामान्य नहीं है। प्रश्न तब उठता है जब उसी देश के अपने मानवाधिकार रिकॉर्ड पर संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाओं की गंभीर टिप्पणियां मौजूद हो। कश्मीर में एक लोकतांत्रिक सरकार है और वहां खुशहाली आई है, दुनिया यह बखूबी देख रही है।

 

इस दृष्टि से नेतन्याहू का संयुक्त राष्ट्र भाषण तुर्की के लिए एक कड़ा राजनीतिक आईना प्रस्तुत करता है। एर्दोआन ने भारत के कश्मीर पर सवाल उठाया, और नेतन्याहू ने उसी अंतरराष्ट्रीय मंच पर तुर्की की अपनी नीतियों और क्षेत्रीय भूमिका पर सवाल खड़े कर दिए। यह भारत का आधिकारिक जवाब नहीं था, फिर भी भारत के लिए यह घटनाक्रम महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि कश्मीर पर लगातार टिप्पणी करने वाले तुर्की की नीतियों पर भी अंतरराष्ट्रीय बहस मौजूद है।


भारत की वास्तविक आधिकारिक प्रतिक्रिया 26 सितंबर को विदेश मंत्री एस. जयशंकर के संयुक्त राष्ट्र संबोधन में सामने आनी है लेकिन नेतन्याहू के भाषण से एर्दोआन  अभी तो सदमें में होंगे। जाहिर है एर्दोआन की कश्मीर पर अनावश्यक टिप्पणी के बाद नेतन्याहू  ने जिस प्रकार तुर्की को सरेआम किया है उससे तुर्की की विश्वसनीयता, मानवाधिकार रिकॉर्ड और दोहरे मानदंडों पर दुनिया में बहस तेज हो गई  है।