सपने में पुराने संसद भवन से संवाद

सपने में पुराने संसद भवन से संवाद

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रात सपने में मेरी मुलाकात पुराने संसद भवन की आत्मा से हुई। वह आत्मा उतनी ही भव्य, गंभीर और गरिमामयी थी, जितना स्वयं संसद वह भवन। उस उम्रदराज भव्य व्यक्तित्व की बात में इतिहास की गहराई थी, लोकतंत्र का धैर्य था और जनता की आकांक्षाओं की अनुगूंज भी।

मैं सिर्फ ईंट-पत्थरों की इमारत नहीं, इतिहास की साक्षी हूं

मैंने पूछा, “आप कौन हैं?”

 

वह मुस्कुराई और बोली, “मैं पुराने संसद भवन की आत्मा हूं। वही संसद भवन, जिसे लोकतंत्र का मंदिर, देश की आत्मा और जनता-जनार्दन की आवाज कहा जाता है।”

 

करीब एक सदी पुराने संसद भवन की आत्मा की आवाज में एक अजीब-सी गंभीरता थी।

 

बातचीत का सिलसिला जारी रखते हुए उसने कहा, “मैं केवल ईंट-पत्थरों से बनी इमारत नहीं हूं। मेरे भीतर देश की संप्रभुता, संविधान की गरिमा और करोड़ों भारतीयों का विश्वास बसता है।”

 

करीब एक सदी के अपने जीवन में मैंने गुलामी भी देखी और आजादी भी। एडविन लुटियंस की डिजाइन, हरबर्ट बेकर की देखरेख और भारतीय श्रमिकों के पसीने से वर्ष 1927 में बनकर तैयार हुई। तब मैं इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल हुआ करती थी। धीरे-धीरे मेरा शुमार दुनिया के बेहतरीन भवनों में होने लगा। मुझे इस पर गर्व था। साथ ही इस बात पर भी कि मैं दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के भारतीयों के लिए एक पवित्र मंदिर जैसी हूं।

 

मैंने राजनीति के महान लोगों को भी देखा है और बौनों को भी

मैंने सत्ता के हस्तांतरण का दौर देखा। संविधान सभा की ऐतिहासिक बैठकों की साक्षी बनी। मेरे गलियारों ने स्वतंत्र भारत के सपनों को आकार लेते सुना। मैंने राजनीति के महामानवों को भी देखा और बौनों को भी। मैंने उन जनप्रतिनिधियों को भी देखा, जिनकी मुद्दों पर बहस विपक्ष के लिए छिले बाँस जैसी होती थी। मैंने उन लोगों को भी देखा, जो उसूलों से समझौता नहीं करते थे और जरूरत पड़ने पर अपनी ही पार्टी के निर्णयों के ठीक उलट खड़े हो जाते थे।

वैचारिक विरोध को प्रतिशोध में बदलते देख मुझे बहुत दुख होता है

आत्मा कुछ देर मौन रही, फिर बोली, “तब एक बात समान थी—सारी तल्खी बहस तक सीमित रहती थी। मतभेद निजी दुश्मनी में नहीं बदलते थे। उस दौर के लोगों में ‘निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय’ वाला जिगरा था। वे आलोचना सुनते थे, उससे सीखते थे और लोकतंत्र को मजबूत बनाते थे।”

बदलाव के बारे में पूछने पर उसका गला रुंध गया

मैंने पूछा, “तब से अब तक क्या-क्या बदल गया?”
 

उसने गहरी साँस ली और कहा, “करीब तीन दशकों से मैं संसदीय परंपराओं में आती गिरावट की भी साक्षी हूं। बहस का स्तर घटा है, संवाद की जगह शोर ने ले ली है और असहमति को कई बार दुश्मनी समझ लिया जाता है। लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता; वह संयम, संवाद, तर्क और परंपराओं के सम्मान से जीवित रहता है।”

 

यह कहते-कहते उसका गला रुंध गया, आँखें नम हो गईं और चेहरा उदास हो उठा।

 

कुछ देर संभलने के बाद उसने फिर बोलना शुरू किया।

 

“अब जब मैं अतीत का हिस्सा बन चुकी हूं, मेरी कामना है कि आगे सब बेहतर हो। नई संसद केवल नई इमारत न हो, बल्कि नई ऊर्जा, नई मर्यादा और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति नई प्रतिबद्धता का प्रतीक बने। वहां बहस हो, लेकिन गरिमा के साथ; विरोध हो, लेकिन वैमनस्य के बिना; और सत्ता हो, तो जनता के प्रति जवाबदेही के साथ।”

 

सपने में हुए इस संवाद को भूलने से पहले सोचा, आप लोगों से भी साझा कर दूं।