भगवान के ठेकेदार और चमत्कार का कारोबार, सोशल मीडिया पर धर्म के नाम पर फैलता अंधविश्वास

भगवान के ठेकेदार और चमत्कार का कारोबार, सोशल मीडिया पर धर्म के नाम पर फैलता अंधविश्वास

Godmen miracle business

भगवान और भक्त के बीच की दूरी जितनी कम है, बाबा और भक्त के बीच का बाजार उतना ही बड़ा होता जा रहा है। कभी भगवान तक पहुंचने के लिए मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा या चर्च जाना पड़ता था। अब मोबाइल की स्क्रीन ही नया दरबार है। बाबा लाइव हैं, चमत्कार लाइव है, आशीर्वाद लाइव है और भक्त भी लाइव है। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले आस्था निजी हुआ करती थी, अब वह कंटेंट है—और कंटेंट जितना सनसनीखेज हो, उसकी कमाई उतनी ज्यादा। 

 

मनुष्य ने सदियों से भगवान को समझने की कोशिश की है। इसी कोशिश के बीच कुछ लोगों ने खुद को भगवान और भक्त के बीच की अनिवार्य कड़ी घोषित कर दिया। कोई संत बना, कोई बाबा, कोई गॉडमैन और कोई चमत्कारी पुरुष। कोई सीधे हनुमानजी को टेलीफोन लगाता है तो कोई उलटे-सीधे प्रयोग से परेशानी दूर करने का दावा करता है। दावा एक ही—हमारे पास वह शक्ति है जो आपके पास नहीं है।

 

बीमारी है? बाबा ठीक कर देंगे। नौकरी नहीं मिल रही? बाबा रास्ता बताएंगे। शादी नहीं हो रही? बाबा उपाय बताएंगे। कारोबार नहीं चल रहा? बाबा ग्रह बदल देंगे। भविष्य जानना है? बाबा सब जानते हैं। और सबसे दिलचस्प बात यह है कि बाबा का दावा जितना बड़ा होता जाता है, भक्त का सवाल उतना छोटा।

अंधविश्वास की असली ताकत डर है

अंधविश्वास हमेशा मूर्ख लोगों में नहीं पनपता। वह अक्सर परेशान लोगों में पनपता है। जिसके घर में कोई बीमार हो, जिसके पास नौकरी न हो, जिसके कारोबार में लगातार नुकसान हो रहा हो, जिसकी संतान परेशान हो या जिसे भविष्य अंधकारमय दिखाई दे रहा हो—उसे तर्क से ज्यादा तत्काल उम्मीद चाहिए।

 

यहीं चमत्कार का बाजार शुरू होता है।

 

विज्ञान कहता है—इलाज में समय लगेगा। व्यवस्था कहती है—प्रक्रिया पूरी करनी होगी। अर्थव्यवस्था कहती है—मेहनत करनी होगी। 
 

बाबा कहता है—बस विश्वास रखो। और संकट में फंसा इंसान इस छोटे से वाक्य में बड़ी राहत खोज लेता है।

 

यही कारण है कि अंधविश्वास को केवल हंसी में उड़ाना भी पर्याप्त नहीं है। उसके पीछे इंसान की असुरक्षा, डर और उम्मीद छिपी होती है। इस कमजोरी को समझने वाले लोग ही उसे सबसे आसानी से बाजार में बदलते हैं।

सोशल मीडिया ने बाबा को आश्रम से निकालकर हमारी जेब में पहुंचा दिया

 

पहले किसी बाबा के चमत्कार की खबर सुनने के लिए किसी भक्त को आश्रम जाना पड़ता था। अब एक रील काफी है। एक वीडियो में बाबा किसी बीमार व्यक्ति के सिर पर हाथ रखते हैं। अगले फ्रेम में वह व्यक्ति ठीक दिखाई देता है।

 

वीडियो वायरल।

 

नीचे हजारों कमेंट— “जय बाबा की।” “साक्षात भगवान।” “जिसे विश्वास नहीं, वह खुद भुगतेगा।”

 

बस, चमत्कार प्रमाणित हो गया।

 

लेकिन किसी ने यह नहीं पूछा कि बीमारी क्या थी? डॉक्टर ने क्या कहा था? इलाज क्या चल रहा था? व्यक्ति वास्तव में ठीक हुआ या नहीं? वीडियो के पहले और बाद की पूरी कहानी क्या थी?

 

क्यों पूछेंगे? हमें चमत्कार पसंद है, प्रक्रिया नहीं।

 

सोशल मीडिया की सबसे बड़ी समस्या यही है कि वहां वायरल होना कई बार सत्य का प्रमाण समझ लिया जाता है।

एक बाबा की सौ भविष्यवाणियों में दो सही निकल जाएं तो उन्हीं दो के वीडियो लाखों बार चलेंगे। बाकी अट्ठानवे गलत भविष्यवाणियां किसी को याद नहीं रहेंगी। यह चमत्कार नहीं, हमारी स्मृति और हमारी मानसिकता का खेल है।

धर्म को बचाने के लिए अंधविश्वास से लड़ना जरूरी है

धर्म और अंधविश्वास एक चीज नहीं हैं। धर्म आपको विनम्र बना सकता है। अंधविश्वास आपको किसी व्यक्ति का अंधभक्त बना सकता है। 

 

धर्म आपको भीतर देखने की प्रेरणा दे सकता है। अंधविश्वास आपको हर समस्या का समाधान बाहर किसी बाबा में खोजने को मजबूर कर सकता है।

 

धर्म प्रश्नों से डरता नहीं। अंधविश्वास सवाल से डरता है। यही फर्क हमें समझना होगा।

 

किसी संत का सम्मान करना अच्छी बात है। किसी आध्यात्मिक व्यक्ति से सीखना भी अच्छी बात है। लेकिन किसी इंसान को सर्वशक्तिमान मान लेना और अपने जीवन के निर्णय उसकी इच्छा पर छोड़ देना खतरनाक है।

 

भगवान में विश्वास व्यक्तिगत आस्था है, लेकिन इंसान को भगवान बना देना सामाजिक जोखिम।

असली चमत्कार क्या है?

शायद हमें चमत्कार की परिभाषा बदलने की जरूरत है। किसी बीमार व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाना चमत्कार है। किसी गरीब बच्चे की पढ़ाई का खर्च उठाना चमत्कार है। किसी बेरोजगार को काम दिलाना चमत्कार है। किसी निराश इंसान को आत्मविश्वास लौटाना चमत्कार है।

 

लेकिन इसके लिए कैमरा नहीं चाहिए। रील नहीं चाहिए। लाखों व्यूज नहीं चाहिए। और शायद इसीलिए ये चमत्कार वायरल नहीं होते। हमें उन लोगों से सावधान रहना चाहिए जो हर समस्या का समाधान अपने पास होने का दावा करते हैं। क्योंकि जो व्यक्ति आपको हर सवाल का जवाब देने का दावा करता है, संभव है कि वह सबसे पहले आपके सवाल पूछने की क्षमता छीनना चाहता हो।

भगवान को एजेंट की जरूरत नहीं

सबसे बड़ा सवाल यही है—अगर भगवान सर्वशक्तिमान हैं, तो उन्हें हमारे और अपने बीच किसी एजेंट की जरूरत क्यों होगी?
 

प्रार्थना के लिए दलाल क्यों? आस्था के लिए फीस क्यों? चमत्कार के लिए पैकेज क्यों? और भगवान तक पहुंचने के लिए किसी इंसान के प्रमाणपत्र की जरूरत क्यों? शायद भगवान से हमारा रिश्ता जितना निजी होगा, बाबा का कारोबार उतना ही छोटा होगा।
 

इसलिए धर्म छोड़ने की जरूरत नहीं है। बाबा के पीछे भागना भी जरूरी नहीं है। जरूरत सिर्फ इतनी है कि आस्था के साथ विवेक भी बचा रहे। क्योंकि आस्था आंखें बंद करके चलना नहीं है।

 

आस्था वह है जिसमें आंखें खुली हों और फिर भी विश्वास कायम रहे।

 

और याद रखिए— जिस समाज में सवाल पूछने वाले कम और चमत्कार बताने वाले ज्यादा हो जाएं, वहां भगवान से ज्यादा खतरा भगवान के ठेकेदारों से होता है। आज सोशल मीडिया पर हमें चमत्कारों की नहीं, सवालों की वायरलिटी चाहिए।

क्योंकि जिस दिन हर बाबा के चमत्कार से पहले एक भक्त पूछेगा—“प्रमाण क्या है?” उस दिन शायद अंधविश्वास की सबसे बड़ी दुकान अपने आप बंद हो जाएगी।
-धर्मराज