
एस्टोनिया के रक्षा मंत्री हैनो पेवकुर ने एक बड़े हथियार सौदे को लेकर उपजे विवाद के बीच अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। यह विवाद लगभग 770 करोड़ (लगभग 70 मिलियन यूरो) के एक रक्षा समझौते से जुड़ा है, जिसके तहत यूक्रेन के लिए गोला-बारूद खरीदे जाने थे। डाटासेल नामक इटली की जिस कंपनी से रक्षा सौदा हुआ था उसे हाल ही भारत की कंपनी ने अधिग्रहित किया। ALSO READ: यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की से मिले विदेश मंत्री जयशंकर, जानिए किन मुद्दों पर हुई चर्चा
बिना अनुभव वाली कंपनी से सौदा
इस पूरे विवाद के केंद्र में इटली की एक कंपनी 'डाटासेल' (Datasell) है, जिसे कुछ समय पहले भारत की एक कंपनी ने अधिग्रहित (acquire) किया था। हैरानी की बात यह है कि इस सौदे के बावजूद डाटासेल ने कभी भी अपने इतिहास में एक भी तोप का गोला नहीं बनाया था। कंपनी की साख और उत्पादन क्षमताओं पर उठे इन सवालों के बाद ही यह पूरा मामला तूल पकड़ा।
Defence Minister Hanno Pevkur has resigned.
Thank you for leading Estonia’s national defence and for your steadfast support for Ukraine.
Hanno Pevkur served as Minister of Defence from 18 July 2022.
During this time, Europe’s security environment has changed significantly, and… pic.twitter.com/3SbelE64Yk
— MoD Estonia (@MoD_Estonia) September 2, 2026
फ्रीज किए गए रूसी फंड का इस्तेमाल
एस्टोनिया ने इस रक्षा सौदे के लिए यूरोप में जब्त किए गए रूस के खातों से प्राप्त फंड का उपयोग किया था। इस डील के तहत खरीदे जाने वाले तोप के गोलों को सीधे यूक्रेन भेजना तय हुआ था, ताकि रूस के खिलाफ युद्ध के मैदान में उनका इस्तेमाल किया जा सके।
ऑर्डर पर ऑडिट एजेंसी के सवाल और इस्तीफा
एस्टोनिया की राष्ट्रीय ऑडिट एजेंसी ने डाटासेल कंपनी की क्षमताओं और उसकी पृष्ठभूमि पर गंभीर सवाल खड़े किए थे। एजेंसी की रिपोर्ट के सामने आने के बाद देश में राजनीतिक दबाव बढ़ गया, जिसके चलते रक्षा मंत्री हैनो पेवकुर को इस्तीफा देना पड़ा। ALSO READ: पाकिस्तान में 100 साल पुराने हिन्दू मंदिर पर बवाल, भारत ने जताई कड़ी आपत्ति, जानें मंदिर गिराने पर क्या बोली सरकार
रक्षा मंत्री की सफाई
इस्तीफे के बाद अपनी सफाई देते हुए पूर्व रक्षा मंत्री ने कहा कि उन्होंने सौदे से जुड़ी मूल फाइलों को नहीं पढ़ा था। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि रक्षा मंत्री का मुख्य काम बड़े सौदों को केवल मंजूरी देना होता है, इसके बावजूद उन्होंने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए पद छोड़ना उचित समझा। इस संवेदनशील मामले पर अभी तक संबंधित भारतीय कंपनी की ओर से कोई आधिकारिक पक्ष या प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।


