
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने न्यू यॉर्क में आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए संघ के विचार, धर्म, और भारतीय परंपरा पर अपनी बात रखी। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि आरएसएस का मकसद सिर्फ और सिर्फ निस्वार्थ सेवा है। अपने संबोधन के दौरान मोहन भागवत ने एक वाकया साझा किया।
उन्होंने कहा, “मुझसे किसी ने पूछा कि आरएसएस जॉइन करने पर मुझे क्या मिलेगा? यह एक बहुत जायज सवाल है। लेकिन मेरा जवाब साफ है कि अगर आप कुछ पाने की नीयत से संघ से जुड़ना चाहते हैं, तो मत आइए। अगर आप समाज और देश की सेवा करने के इरादे से आना चाहते हैं, तो आपके लिए यहां जगह है।”
कुत्ते की आंख का उदाहरण : भागवत ने कहा कि वे कोई धार्मिक विद्वान नहीं हैं, लेकिन एक ऐसे समाज का हिस्सा हैं जो मानता है कि रास्ते भले ही अलग हों, लेकिन मानवता एक है। उन्होंने एक वैज्ञानिक और दार्शनिक उदाहरण देते हुए समझाया, “कुत्ते की आंखें सिर्फ दो रंग (काला और सफेद) देख पाती हैं। अगर हम उसे रंगों की दुनिया समझाएं, तो वह नहीं समझेगा। वह अपने अनुभव के आधार पर सही है। ठीक वैसे ही, एक इंसान के रूप में हम सात रंग देखते हैं”
उन्होंने श्लोक का जिक्र करते हुए कहा, 'रुचिनां वैचित्र्यात् रुजु कुटिल नानापथ जुषां, नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव' जिस तरह आसमान से गिरने वाली हर बूंद अंत में समुद्र में ही मिलती है, उसी तरह सभी धार्मिक मार्ग एक ही ईश्वर और सत्य की ओर ले जाते हैं।
मोहन भागवत ने भारतीय परंपरा का जिक्र करते हुए कहा कि जब दुनिया में लोगों को कहीं पनाह नहीं मिली, तब भारत ने उन्हें गले लगाया। यही भारत का इतिहास रहा है। लेकिन समय के साथ विदेशी आक्रमणों और शिक्षा के अभाव के कारण समाज में कुछ विकृतियां आईं।
उन्होंने साफ किया कि खुद को 'हिंदू' कहने वाले व्यक्ति को यह मानना होगा कि सभी रास्ते एक ही सत्य की ओर जाते हैं और हर इंसान की गरिमा समान है। भागवत ने 'विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि…' का संदर्भ देते हुए कहा कि एक सच्चा ज्ञानी सभी जीवों को समान दृष्टि से देखता है। आरएसएस का मकसद इसी प्राचीन ज्ञान और मानवता के भाव को फिर से समाज में जगाना है।


