
आजकल लोग सोशल मीडिया के आधार पर ही अपनी धारणाएं बनाने लगे हैं। जबकि इस मंच की सच्चाई यह है कि जिसे धर्म का ज़रा भी ज्ञान नहीं है, वह भी ज्ञानी बना बैठा है; और जिसे राजनीति की रत्ती भर समझ नहीं है, वह भी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय विषयों पर अपने प्रवचन दे रहा है। जो न तो पत्रकार हैं, न संत, ज्योतिष, न एक्सपर्ट और न ही डॉक्टर—वे भी इन सभी भूमिकाओं का दावा कर रहे हैं। आइए, इसी विषय और नजरिये पर आधारित यह आलेख पढ़ते हैं:-
सोशल मीडिया का छद्म ज्ञान और नजरिये का भ्रम
डिजिटल क्रांति के इस दौर में ज्ञान की परिभाषा ही बदल गई है। सोशल मीडिया एक ऐसा विशाल मंच बन चुका है जहाँ हर व्यक्ति के पास अपनी राय व्यक्त करने का अधिकार तो है, लेकिन उस राय के पीछे सत्यता और प्रमाणिकता का अभाव तेजी से बढ़ रहा है।
आज के डिजिटल युग में सोशल मीडिया हमारी दिनचर्या ही नहीं, बल्कि हमारी सोच और धारणाओं को संचालित करने वाला सबसे बड़ा केंद्र बन चुका है। लेकिन इस आभासी दुनिया की सबसे चिंताजनक सच्चाई यह है कि यहाँ बिना किसी योग्यता या प्रामाणिकता के हर विषय पर ज्ञान बांटा जा रहा है।
विशेषज्ञता का ढोंग: आज चिकित्सा से लेकर कानून और अध्यात्म से लेकर राजनीति तक—हर विषय पर आधे-अधूरे ज्ञान के साथ 'विशेषज्ञ' मौजूद हैं। एक 15-सेकंड की रील या 280 अक्षरों का पोस्ट किसी गहन विषय का सत्य नहीं हो सकता।
भ्रामक धारणाएं: जब लोग बिना जांचे-परखे इस छद्म ज्ञान को सच मान लेते हैं, तो वे एक संकीर्ण और गलत नजरिये का शिकार हो जाते हैं।
सत्य और सूचना में अंतर: सूचना का भंडार होना 'ज्ञान' नहीं है और किसी की निजी राय 'सत्य' नहीं हो सकती। सच तक पहुँचने के लिए गहराई, अध्ययन और निष्पक्षता की आवश्यकता होती है, जो सोशल मीडिया के शोर में अक्सर खो जाती है।
सत्य एक विशाल और अनंत आकाश की तरह है, जबकि हमारा 'नजरिया' उस आकाश को देखने वाली एक छोटी सी खिड़की है। जीवन में हम जो कुछ भी देखते, सुनते या महसूस करते हैं, उसे अक्सर 'परम सत्य' मान लेते हैं। लेकिन वास्तव में, वह केवल हमारा एक दृष्टिकोण या नजरिया होता है। किसी एक नजरिये से सच को पूरी तरह जान पाना असंभव है, क्योंकि नजरिया व्यक्ति की मान्यताओं, प्रभाव, अनुभवों और परिस्थितियों की सीमा में बंधा होता है।
हाथी और छह अंधे व्यक्तियों की कथा
नजरिये और सत्य के अंतर को समझने के लिए भारत की एक प्राचीन लोककथा सबसे बेहतरीन उदाहरण है। छह दृष्टिहीन व्यक्तियों ने जब पहली बार एक हाथी को छुआ, तो सबने अपने-अपने अनुभव के आधार पर हाथी को परिभाषित किया। जिसने कान पकड़ा, उसने हाथी को सूप (सूपा) बताया; जिसने पैर छुआ, उसने खंभा कहा; जिसने पूंछ पकड़ी, उसने रस्सी बताया।
उन छहों व्यक्तियों का अपना-अपना नजरिया सही था, क्योंकि उन्होंने जो महसूस किया, वही कहा। लेकिन क्या उनमें से किसी का भी नजरिया पूरे 'हाथी' के सच को बयान कर सका? बिल्कुल नहीं। सच यह था कि हाथी उन सभी अनुभवों का एक सम्मिलित रूप था। ठीक इसी तरह, जब हम अपने किसी एक विचार या नजरिये को सच मान लेते हैं, तो हम बाकी के पूरे सत्य को नकार रहे होते हैं।
नजरिये की सीमाएं
हमारा नजरिया हमारे अतीत के अनुभवों, परवरिश, प्रभाव, धर्म, संस्कृति और उस क्षण की हमारी मानसिक स्थिति से तय होता है। दो लोग एक ही घटना को पूरी तरह से अलग-अलग तरीके से देख सकते हैं:
संख्या 6 और 9 का भ्रम: फर्श पर लिखा एक अंक एक तरफ खड़े व्यक्ति को 6 दिखेगा, तो दूसरी तरफ खड़े व्यक्ति को 9। दोनों अपनी जगह सही हैं, लेकिन मूल सच यह है कि वह फर्श पर उकेरी गई एक तटस्थ (neutral) आकृति है।
समय और स्थिति का प्रभाव: एक ही परिस्थिति एक व्यक्ति के लिए आपदा हो सकती है और दूसरे के लिए अवसर।
सत्य का वास्तविक स्वरूप
सत्य निरपेक्ष और अखंड होता है, जबकि नजरिया सापेक्ष और सीमित होता है। जब हम यह मान लेते हैं कि “केवल मेरा ही नजरिया सच है”, तो वहीं से अहंकार, विवाद और पूर्वाग्रह का जन्म होता है। दुनिया के तमाम वैचारिक मतभेद, युद्ध और पारिवारिक कलह का मूल कारण यही है कि लोग अपने 'नजरिये' को ही 'सत्य' मान बैठने की भूल कर बैठते हैं।
अंत में आज के संदर्भ में: दूसरों की रील्स और पोस्ट्स से अपना नजरिया बनाने के बजाय, तथ्यों की जांच करना, मूल किताब को पढ़ना और विवेक का प्रयोग करना आज की सबसे बड़ी जरूरत है, क्योंकि वर्तमान में सभी राजनीतिक दल जेन जी का नजरिया बदलने में लगे है।


