असम में क्यों हो रहा है इतना निवेश?

असम में क्यों हो रहा है इतना निवेश?

investment in assam

प्रभाकर मणि तिवारी

असम अपनी बेहतर क्वालिटी की चाय के उत्पादन के लिए पूरी दुनिया में मशहूर रहा है। अस्सी के दशक में घुसपैठ और उग्रवाद ने इसकी छवि एक ऐसे राज्य के तौर पर बना दी जहां निवेशक तो दूर बाहरी राज्यों के लोग भी आने से डरते थे। लेकिन अब बीते कुछ साल से यह तस्वीर तेजी से बदल रही है। पहले उद्योग के नाम पर राज्य में या तो चाय बागान थे या फिर सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम। लेकिन अब बड़े पैमाने पर देशी विदेशी निवेश की वजह से असम दक्षिण एशिया का सप्लाई चेन हब बनने की राह पर बढ़ रहा है। ALSO READ: राज्यपालों के कार्यकाल पर क्या कहता है भारत का संविधान

 

राज्य सरकार ने अगले पांच साल में राज्य में बुनियादी ढांचे को विकसित करने पर करीब डेढ़ लाख करोड़ रुपये खर्च करने का एलान किया है।

 

असम का असंगठित क्षेत्र

वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक, असम की करीब सवा तीन करोड़ की आबादी में से एक तिहाई युवा है। लेकिन राज्य में चाय बागानों, खेती, हथकरघा के अलावा रोजगार का कोई साधन नहीं है। चाय बागान मजदूरों और छोटे किसानों के अलावा राज्य के पारंपरिक हथकरघा और रेशम उद्योग में काम करने वाले लाखों कारीगर असंगठित क्षेत्र का हिस्सा हैं।

 

तिनसुकिया के एक कालेज में समाज विज्ञान के प्रोफेसर रहे डा. सुकांत कर डीडब्ल्यू से कहते हैं, राज्य के सार्वजनिक उपक्रमों में काम करने वाले ज्यादातर लोग बाहरी राज्यों के हैं। राज्य सरकार के उपक्रमों में स्थानीय लोग जरूर हैं। लेकिन सरकारी कर्मचारियों की संख्या करीब साढ़े चार लाख ही है। ऐसे में निजी निवेशकों के आने से युवा आबादी के लिए रोजगार के नए मौके पैदा होंगे।

 

विदेशी निवेश आकर्षित करने के लिए मुख्यमंत्री हिमंता बिस्व सरमा के नेतृत्व में असम के एक प्रतिनिधिमंडल ने इस साल जनवरी में पहली बार दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (डब्ल्यूईएफ) में शिरकत की। वहां शर्मा ने असम को देश के विकास के परिदृश्य में एक स्वाभाविक मंजिल बताते हुए विदेशी निवेशकों से हरित ऊर्जा, सेमीकंडक्टर और पर्यटन के क्षेत्र में राज्य की अपार संभावनाओं का पता लगाने और इन क्षेत्रों में निवेश करने की अपील की। सरकार का दावा है कि दावोस में बातचीत के दौरान विभिन्न कंपनियों ने राज्य में हरित ऊर्जा, इलेक्ट्रॉनिक्स और सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन में करीब एक लाख करोड़ रुपये के निवेश का भरोसा दिया है। ALSO READ: भारत में नए नए हाईवे और एक्सप्रेसवे आखिर टूट क्यों रहे हैं?

 

असम में बढ़ता निवेश

टाटा समूह ने राज्य के जागी रोड में करीब तीस हजार करोड़ की लागत से एक सेमीकंडक्टर प्लांट लगाया है। अब इसकी वजह से छोटे-छोटे पुर्जे बनाने वाली कंपनियां और विदेशी निवेशक भी आकर्षित हो रहे हैं। इसके ऑटोमोटिव मॉड्यूल के लिए मैन्युफैक्चरिंग पार्टनर के तौर पर अग्रणी वैश्विक कंपनी क्वालकॉम भी राज्य में पहुंची है। इससे असम पहली  बार ग्लोबल सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन का हिस्सा बन गया है।

 

सरकार का दावा है कि कई जापानी कंपनियों ने भी राज्य में बड़े पैमाने पर निवेश की योजना बनाई है। जापानी प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची को बीते जून में असम के दौरे पर आना था। लेकिन किसी वजह से वह दौरा टल गया था और प्रस्तावित बैठक दिल्ली में हुई। जापानी कंपनियों की ओर से राज्य में बड़े पैमाने पर संभावित निवेश को ध्यान में रखते हुए राज्य की ओर से संचालित पूर्वोत्तर कौशल केंद्र सक्रिय रूप से जापानी भाषा के अलावा कई तकनीकी कार्यक्रम चला रहा है।

 

जापान बैंक फॉर इंटरनेशनल कोआपरेशन और कुछ निजी निवेशक गोलाघाट जिले के नुमलीगढ़ में एक बायोरिफाइनरी के लिए 408 मिलियन डॉलर की वित्तीय सहायता दे रहे हैं। इसमें बांस से इथेनॉल बनाया जाएगा। इस साझा उपक्रम में फिनलैंड की दो कंपनियां फोर्टम और केमपोलिस भी शामिल है। यह दोनों बायो रिफाइनरी को तकनीक मुहैया कराएंगी। इस रिफाइनरी के लिए पूर्वोत्तर के करीब तीस हजार किसानो से कच्चा माल यानी बांस खरीदा जाएगा।

 

जापानी कंपनी सुजुकी ने राज्य में एक बायोगैस संयंत्र की स्थापना के लिए स्थानीय सहयोगियों के साथ हाथ मिलाया है।

 

केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के तहत डिपार्टमेंट फार प्रमोशन आफ इंडस्ट्री एंड इंटरनल ट्रेड (डीपीआईआईटी) के आंकड़ों के मुताबिक, राज्य में अक्तूबर, 2019 से इस साल मार्च तक 26.10 मिलियन डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आया है।

 

राज्य सरकार ते मुताबिक, सिंगापुर की कई कंपनियां असम के लॉजिस्टिक्स सेक्टर में तेजी से निवेश कर रही हैं। इसके अलावा एससीजी इंटरनेशनल और ग्लोबल पावर सिनर्जी  जैसे थाई ग्रुप असम में हरित ऊर्जा, बुनियादी ढांचे और मैटीरियल सप्लाई चेन सेक्टर में निवेश की संभावनाएं तलाशते हुए अपनी मौजूदगी बढ़ा रहे हैं। ALSO READ: मानसून का बदलता पैटर्न बढ़ा रहा भारत का जलवायु संकट

 

क्यों असम को चुन रहे हैं निवेशक

लेकिन आखिर राज्य के बदलते औद्योगिक परिदृश्य की क्या वजह है? विश्लेषकों का कहना है कि हाल के वर्षों में राज्य में सुरक्षा का परिदृश्य बदला है। राज्य सरकार बुनियादी ढांचा विकसित करने पर काफी जोर दे रही है। वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक समुद्र गुप्त कश्यप डीडब्ल्यू से कहते हैं, “हिमंता बिस्वा सरमा की सरकार ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सामने असम को निवेश के आकर्षक ठिकाने के तौर पर बढ़ावा देकर इसे भारत की एक्ट ईस्ट नीति के लिए एक रणनीतिक प्रवेश द्वार के के तौर पर स्थापित किया है।”

 

उनका कहना है, “खासकर टाटा समूह की ओर से सेमीकंडक्टर संयंत्र स्थापित किए जाने के बाद देशी, विदेशी कंपनियों में यह ठोस संदेश गया है कि असम में निवेश के अनुकूल सुरक्षित माहौल है।”

 

राजनीतिक विश्लेषक श्यामाकांत बरुआ डीडब्ल्यू से कहते हैं, असम की भौगोलिक स्थिति भी बड़े उद्योगों के लिए अनुकूल है। दक्षिण एशिया के नजदीक होने के कारण यहां से निर्यात में सहूलियत होगी।

 

कश्यप भी उनसे सहमत हैं। वो कहते हैं, “अब पूर्वोत्तर में ज्यादातर राज्यों तक रेलवे और सड़क का बेहतर नेटवर्क है। इसके अलावा ब्रह्मपुत्र में जल परिवहन भी शुरू हो गया है। ऐसे में यहां बनने वाले सामान को पूर्वोत्तर के अलावा देश के दूसरे राज्यों तक भेजना काफी आसान हो गया है।”

 

उनका कहना था, “यहां से निर्यात के लिए जल मार्ग के जरिए कोलकाता पोर्ट तक सामान भेजा जा सकता है। इसके साथ ही बांग्लादेश से देर-सबेर रिश्ते सुधरने के बाद चटगांव पोर्ट तक भी पहुंच आसान हो जाएगी। इसके साथ ही म्यांमार के सितवे पोर्ट को विकसित करने और वहां से मिजोरम की राजधानी आइजल को जोड़ने वाली सड़क का काम भी चल रहा है।” ALSO READ: क्या स्वस्थ रहने के लिए 8 घंटे सोना सच में जरूरी है?

 

बढ़ते निवेश के साथ चिंता भी बढ़ी

दूसरी ओर, इस तेज औद्योगीकरण ने चिंता भी बढ़ाई है। खासकर पर्यावरणविदों को आशंका है कि नए उद्योगों को लिए जंगल और पेड़ों की कटाई तेज हो सकती है। इसका पर्यावरण पर प्रतिकूल असर पड़ेगा।

 

पर्यावरणविद दिनेश हाजरा डीडब्ल्यू से बातचीत में काजीरंगा नेशनल पार्क में कुछ साल पहले पंचसितारा होटल खोलने के सरकार के फैसले और उस पर होने वाले विवाद की मिसाल देते हैं। उनका कहना था, “असम को उद्योग, निवेश और रोजगार की जरूरत तो है। लेकिन पर्यावरण की कीमत पर ऐसा नहीं किया जाना चाहिए।”

 

हाजरा कहते हैं, “काजीरंगा नेशनल पार्क का इलाका पहले ही घट रहा है। हर साल आने वाली बाढ़ के दौरान इसका बड़ा इलाका नदी में समा जाता है। ऐसे में किसी बड़े उद्योग को अनुमति देने से पहले पर्यावरण के नियमों का पालन किया जाना चाहिए। राज्य में ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन का असर पहले से ही नजर आ रहा है। अब औद्योगीकरण के साथ पर्यावरण को सुरक्षित रखने के उपायों पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।”