एमएलसी चुनाव में कोई नैरेटिव पूरा नहीं है

विधान परिषद के चुनाव नतीजों को लेकर अलग अलग किस्म के नैरेटिव बनाए जा रहे हैं। सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की है कि यूजीसी के दिशा निर्देशों के कारण सवर्ण भाजपा से नाराज हैं और उन्होंने इस चुनाव में भाजपा को हरवाया है। बिहार और उत्तर प्रदेश के नतीजों की व्याख्या इस नैरेटिव के आधार पर की जा रही है। बिहार में राजद और उत्तर प्रदेश में सपा की ओर से बताया जा रहा है कि उसका गठबंधन समावेशी है और हर जाति का वोट उसको मिल रहा है। उधर महाराष्ट्र में तीन सीटों पर हार के बाद महायुति में घमासान मचा है और भाजपा के नेता कम से कम दो सीटों की हार के लिए एकनाथ शिंदे की शिवसेना को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। कर्नाटक में सारा ठीकरा डीके शिवकुमार के ऊपर फोड़ा जा रहा है। यह भी कहा जा रहा है कि सिद्धारमैया को हटाने की वजह से कांग्रेस पार्टी हारी है।

लेकिन इनमें से कोई भई नैरेटिव ऐसा नहीं है, जिससे पूरी तस्वीर सामने आए। जैसे अगर बिहार की बात करें तो किसी सवर्ण का राजद की टिकट से जीतना कोई अभूतपूर्व बात नहीं है। चार साल पहले स्थानीय निकाय प्रतनिधियों वाले एमएलसी क्षेत्र का चुनाव हुआ था तो राजद से तीन भूमिहार जीत गए थे। उस समय तो यूजीसी नहीं था। फिर भी उसके सवर्ण उम्मीदवार जीते। ऐसे ही यूजीसी का नैरेटिव काम करता तो भाजपा छह सीट नहीं जीत जाती। ऐसा नहीं हो सकता है कि पांच सीटों पर यूजीसी का नैरेटिव चला और छह पर नहीं चला। उधर महाराष्ट्र में भी सिर्फ यह कहना कि एकनाथ शिंदे ने शरद पवार की पार्टी को पुणे और छत्रपति संभाजीनगर सीट पर जीता दिया, ठीक नहीं है। मराठा आरक्षण आंदोलन के नेता मनोज जरांगे पाटिल को लेकर पिछले दिनों जिस तरह का विवाद हुआ। उसके बाद मराठों के बीच शरद पवार की पार्टी के बारे में सकारात्मक धारणा बनी है।