नेपाल तबाही के बावजूद नहीं माना चीन : ब्रह्मपुत्र पर 14 लाख करोड़ का ‘सदी का बांध’ बनाने की ज़िद, भारत के पूर्वोत्तर पर बड़ा संकट?

नेपाल तबाही के बावजूद नहीं माना चीन : ब्रह्मपुत्र पर 14 लाख करोड़ का 'सदी का बांध' बनाने की ज़िद, भारत के पूर्वोत्तर पर बड़ा संकट?

China Brahmaputra Dam

China Brahmaputra Dam: तिब्बत के 'ग्रेट बैंड' (Great Bend) क्षेत्र में यारलुंग ज़ंगबो (ब्रह्मपुत्र नदी) के निचले प्रवाह पर चीन द्वारा 60 गीगावाट (GW) क्षमता की 'यारलुंग ज़ंगबो लोअर रीचेस हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट' का निर्माण भारत की सामरिक और जल सुरक्षा के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है।

14 लाख करोड़ (1.2 ट्रिलियन युआन) की लागत से बनने वाली यह परियोजना न केवल दुनिया का सबसे बड़ा जलविद्युत ढांचा (विश्व प्रसिद्ध 'थ्री गॉर्जियस डैम' से तीन गुना बड़ा) है, बल्कि यह सीधे भारत के अरुणाचल प्रदेश और असम की जीवन रेखा को प्रभावित करने की क्षमता रखता है।
परियोजना की पूरी इनसाइड स्टोरी

 

China Brahmaputra Dam

 

 'ग्रेट बैंड' (बड़ा मोड़) पर इंजीनियरिंग की बिसात

यह विशाल बांध ब्रह्मपुत्र नदी के उस हिस्से पर बनाया जा रहा है जिसे ग्रेट बैंड” (Great Bend) कहा जाता है। यहाँ से नदी एक तीखा मोड़ लेते हुए तेजी से भारत के अरुणाचल प्रदेश की ओर गिरती है।

  • रन-ऑफ-द-रिवर का दावा : यद्यपि चीन इसे 'रन-ऑफ-द-रिवर' परियोजना बता रहा है, लेकिन इसमें न्यिंगची के ऊपरी क्षेत्र मेनलिंग में एक विशाल जलाशय (Reservoir) का निर्माण शामिल है।
  • 40 किमी लंबी सुरंग : नदी के पानी को लगभग 40 किलोमीटर लंबी विशाल सुरंग के माध्यम से मोड़कर 5 पावरहाउस संचालित किए जाएंगे, जिसके बाद पानी पुनः निचले प्रवाह में मिल जाएगा।
  • जांगमू बांध का अनुभव : चीन पहले ही मध्य प्रवाह पर जांगमू बांध बना चुका है, जिससे तिब्बत की 26% बिजली मांग पूरी होती है।

भारत की 3 मुख्य चिंताएं और सामरिक कोण

चीन की इस ज़िद से भारत के पूर्वोत्तर राज्यों (विशेष रूप से अरुणाचल प्रदेश और असम) के लिए गंभीर स्थिति उत्पन्न हो गई है:

  1. जल प्रवाह और जलाशय का नियंत्रण : ऊपरी इलाके मेनलिंग में जलाशय बनने से चीन के पास ब्रह्मपुत्र के पानी को रोकने या अचानक छोड़ने की चाबी आ जाएगी। सूखे के मौसम में पानी रोका जा सकता है और मानसून में अचानक छोड़कर निचले इलाकों में कृत्रिम बाढ़ लाई जा सकती है।
  2. पारिस्थितिकी व भूकंपीय जोखिम: यह पूरा हिमालयी बेल्ट अत्यधिक संवेदनशील टेकटोनिक प्लेट्स (Seismic Zone V) पर स्थित है। हाल ही में नेपाल-चीन सीमा पर आए हिमस्खलन इस बात का प्रमाण हैं। इतने बड़े पैमाने पर टनलिंग और निर्माण से भूस्खलन व बांध टूटने का खतरा कई गुना बढ़ जाएगा।
  3. डेटा साझाकरण में अनिश्चितता: यद्यपि दोनों देशों के बीच 'विशेषज्ञ-स्तरीय तंत्र' (Expert-Level Mechanism) मौजूद है, लेकिन सीमा तनाव के दौरान चीन द्वारा हाइड्रोलॉजिकल डेटा (जल-विज्ञान आंकड़े) देना निलंबित कर दिया जाता है, जिससे भारत समय पर बाढ़ की अग्रिम चेतावनी जारी करने में असमर्थ हो जाता है।

भारत की जल सुरक्षा पर मुख्य प्रभाव (Water Security Impact)

(A) 'वाटर वेपन' (Water Weapon) या कृत्रिम नियंत्रण का खतरा
यद्यपि बीजिंग इसे पर्यावरण-अनुकूल 'रन-ऑफ-द-रिवर' (Run-of-the-river) परियोजना बताता है, लेकिन इसमें तिब्बत के न्यिंगची स्थित मेनलिंग में एक विशाल जलाशय (Reservoir) और 40 किलोमीटर लंबी सुरंग शामिल है।

  • सूखे के मौसम में पानी का कम होना : शीत ऋतु या शुष्क मौसम (Lean Season) में चीन यदि जलाशय में पानी रोकता है, तो भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में पानी का प्राकृतिक प्रवाह 20% से 30% तक घट सकता है, जिससे कृषि, पेयजल और मत्स्य पालन संकट में आ जाएंगे।
  • आकस्मिक डिस्चार्ज और कृत्रिम बाढ़ : मानसून के दौरान चीन द्वारा बिना पूर्व चेतावनी भारी मात्रा में पानी छोड़ने पर असम के मैदानी इलाकों में अचानक विनाशकारी बाढ़ (Flash Floods) आ सकती है।

(B) हाइड्रोलॉजिकल डेटा साझाकरण में अनिश्चितता
भारत और चीन के बीच जल-विज्ञान संबंधी डेटा (पानी का बहाव और स्तर) साझा करने का समझौता है। लेकिन पूर्व के अनुभवों (जैसे 2017 के डोकलाम विवाद) में देखा गया है कि सीमा पर राजनीतिक या सैन्य तनाव के दौरान चीन अचानक डेटा रोक देता है। विश्वसनीय पूर्व चेतावनी के अभाव में भारत की आपदा प्रबंधन एजेंसियां समय पर कार्रवाई करने में असमर्थ हो जाती हैं।

China Brahmaputra Dam

(A) अरुणाचल प्रदेश : सियांग नदी का बिगड़ता स्वरूप

  • ब्रह्मपुत्र जब अरुणाचल प्रदेश में प्रवेश करती है, तो इसे सियांग (Siang) कहा जाता है।
  • ऊपरी क्षेत्र में बड़े पैमाने पर टनलिंग और ब्लास्टिंग के कारण नदी के पानी में अत्यधिक गाद (Silt/Sediment) और मलबे की मात्रा बढ़ जाएगी, जिससे पानी पीने योग्य नहीं रहेगा और स्थानीय जलीय जीव नष्ट हो जाएंगे।
  • चीन के नियंत्रण से सीमावर्ती क्षेत्रों में अचानक जलस्तर के उतार-चढ़ाव से नदी तटबंधों का कटाव (Soil Erosion) तेज होगा।

(B) असम : ब्रह्मपुत्र घाटी की जैव-विविधता पर प्रहार

  • काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान पर खतरा : काजीरंगा का अनूठा पारिस्थितिकी तंत्र ब्रह्मपुत्र के प्राकृतिक जल चक्र और बाढ़ पर निर्भर है। पानी के अप्राकृतिक प्रवाह से एक-सींग वाले गैंडों और दुर्लभ वनस्पतियों के अस्तित्व पर खतरा मंडराएगा।
  • माजुली द्वीप का अस्तित्व संकट में: दुनिया के सबसे बड़े नदी द्वीप 'माजुली' (Majuli) का क्षेत्र पहले से ही कटाव के कारण घट रहा है। बांध से होने वाले अनियमित प्रवाह से माजुली का बचा हुआ हिस्सा भी जलमग्न होने या कटने के कगार पर पहुंच सकता है।

पारिस्थितिकीय और भूगर्भीय जोखिम (Ecological & Seismic Hazards)

  1. अत्यधिक भूकंप-संवेदनशील क्षेत्र (Seismic Zone V): 'ग्रेट बैंड' हिमालयन सिंटैक्सिस (Himalayan Syntaxis) पर स्थित है, जहां भारतीय और यूरेशियन प्लेट आपस में टकराती हैं। यहां 7+ तीव्रता के भूकंप आने की संभावना हमेशा बनी रहती है।
  2. बांध टूटने (Dam Failure) का भयानक खतरा : यदि भूकंप या लैंडस्लाइड के कारण चीन का यह विशाल बांध या जलाशय क्षतिग्रस्त होता है, तो लाखों क्यूसेक पानी अरुणाचल और असम को जलमग्न कर देगा, जिससे लाखों इंसानी जानें जा सकती हैं।

भारत का जवाबी और रणनीतिक एक्शन प्लान

चीन के इस 'जल-घेराबंदी' (Water Encirclement) का मुकाबला करने के लिए भारत ने अपनी रणनीति तेज कर दी है:

  • अरुणाचल प्रदेश में 'सियांग अपर मल्टीपर्पज प्रोजेक्ट' (Siang Upper Multipurpose Project): भारत सरकार अरुणाचल में 11 GW क्षमता वाले विशाल बांध के निर्माण की योजना पर तेजी से काम कर रही है। इसका मुख्य उद्देश्य बिजली बनाना नहीं, बल्कि चीन द्वारा अचानक छोड़े गए पानी को बफर के रूप में स्टोर करना और सूखे के दौरान पानी का प्रवाह बनाए रखना है।
  • अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कूटनीतिक दबाव : भारत, बांग्लादेश के साथ मिलकर (जो ब्रह्मपुत्र का तीसरा सबसे बड़ा प्रभावित देश है) ट्रांस-बाउंड्री नदियों पर बहुपक्षीय संधि और तीसरे पक्ष की निगरानी (Third-party inspection) के लिए वैश्विक कूटनीतिक दबाव बढ़ा रहा है।
  • सैटेलाइट आधारित निगरानी : भारत की अंतरिक्ष एजेंसी (ISRO) और सैन्य उपग्रह तिब्बत में यारलुंग ज़ंगबो के प्रवाह, टनल निर्माण और जलाशयों में पानी के स्तर पर 24×7 रियल-टाइम निगरानी रख रहे हैं।

चीन का आधिकारिक पक्ष

दूसरी ओर, चीनी विदेश मंत्रालय का दावा है कि बीजिंग एक ज़िम्मेदार रुख अपना रहा है। चीन का तर्क है कि यह परियोजना पूरी नदी घाटी में बाढ़ नियंत्रण और आपदा प्रबंधन में मददगार साबित होगी तथा इससे भारत या बांग्लादेश जैसे निचले प्रवाह वाले देशों को कोई नुकसान नहीं पहुंचेगा।