
भोपाल। मध्यप्रदेश में लंबे समय से चल रहा शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) की अनिवार्यता का विवाद एक बार फिर सियासी मुद्दा बन गया है। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को पत्र लिखकर TET के मुद्दे पर विधानसभा का विशेष सत्र बुलाने की मांग की है। सिंघार ने तमिलनाडु की तर्ज पर मध्यप्रदेश में भी पुराने शिक्षकों को TET की अनिवार्यता से राहत देने के लिए विधानसभा में प्रस्ताव पारित करने की मांग की है।
नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने पूरे मुद्दें को उठाते हुए कहा कि TET की अनिवार्यता से प्रदेश में लंबे समय से सेवाएं दे रहे करीब 1.50 लाख शिक्षक और उनके परिवार प्रभावित हो रहे हैं। उनका कहना है कि परीक्षा की अनिवार्यता का सीधा असर शिक्षकों की सेवा-निरंतरता, पदोन्नति और अन्य सेवा लाभों पर पड़ रहा है। ऐसे में सरकार को शिक्षकों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए इस मामले में गंभीरता से निर्णय लेना चाहिए।
नेता प्रतिपक्ष ने अपने पत्र में तमिलनाडु विधानसभा के 25 अगस्त 2026 के प्रस्ताव का हवाला दिया है। तमिलनाडु विधानसभा ने 23 अगस्त 2010 से पहले नियुक्त शिक्षकों को TET की अनिवार्यता से स्थायी छूट देने तथा उनकी सेवा और पदोन्नति संबंधी हितों के संरक्षण की मांग की है। प्रस्ताव में केंद्र से शिक्षा का अधिकार अधिनियम में आवश्यक संशोधन करने और संबंधित दिशा-निर्देश जारी करने का आग्रह भी किया गया है। इसी आधार पर सिंघार का तर्क है कि मध्यप्रदेश में भी विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर शिक्षकों की स्थिति पर चर्चा की जाए और तमिलनाडु की तर्ज पर राहत का रास्ता निकाला जाए।
राहुल गांधी तक पहुंचा शिक्षकों का मुद्दा- वहीं TET को लेकर शिक्षकों के एक संगठन के प्रतिनिधियों ने दिल्ली में कांग्रेस नेता राहुल गांधी से मुलाकात कर उनसे दखल देने की मांग की है।संगठन ने राहुल गांधी से शिक्षकों के पक्ष में हस्तक्षेप करने और इस मामले को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने की मांग की। संगठन के अनुसार, राहुल गांधी ने शिक्षकों की बात सुनी और इस मुद्दे को उठाने का भरोसा दिया। शिक्षक संगठनों का दावा है कि यह केवल मध्यप्रदेश का मामला नहीं है, बल्कि देशभर में करीब 25 लाख शिक्षक इससे प्रभावित हो सकते हैं। ऐसे में वे चाहते हैं कि TET को लेकर केंद्र स्तर पर भी स्पष्ट निर्णय लिया जाए।
TET पर शिक्षकों की क्या हैं मांगें?-TET की अनिवार्यता के विरोध में शिक्षक संगठनों की प्रमुख मांग है कि 23 अगस्त 2010 से पहले नियुक्त शिक्षकों को TET से पूर्ण और स्थायी छूट दी जाए। संगठनों का तर्क है कि इन शिक्षकों की नियुक्ति उस समय लागू नियमों और निर्धारित शैक्षणिक योग्यता के आधार पर हुई थी। वर्षों तक सेवा देने के बाद अब उन पर नई पात्रता शर्त लागू करना उनके लिए नौकरी की सुरक्षा और भविष्य को लेकर गंभीर संकट पैदा कर रहा है।
शिक्षक संगठन केवल TET से छूट ही नहीं, बल्कि वरिष्ठता, पदोन्नति, सेवा-निरंतरता और अन्य सेवा लाभों का संरक्षण भी चाहते हैं। उनका कहना है कि यदि सरकार परीक्षा आयोजित करती है तो लंबे समय से कार्यरत शिक्षकों के लिए अलग और व्यावहारिक व्यवस्था बनाई जाए। मध्यप्रदेश में 2005 से 2009 के बीच नियुक्त शिक्षकों को लेकर यह मांग विशेष रूप से जोर पकड़ रही है।


