मेरठ में Electric Chak ने बदली कुम्हारों की जिंदगी! 210 से ज्यादा परिवारों को फायदा, 5 गुना तक बढ़ी आमदनी

मेरठ में Electric Chak ने बदली कुम्हारों की जिंदगी! 210 से ज्यादा परिवारों को फायदा, 5 गुना तक बढ़ी आमदनी

khumar

कभी हाथों की मेहनत और धीमे घूमते पारंपरिक चाक तक सीमित कुम्हारों का कारोबार अब बिजली की रफ्तार पकड़ रहा है। योगी सरकार की ग्रामोद्योग विकास योजना ने मिट्टी को आकार देने वाले कारीगरों के हुनर को आधुनिक तकनीक का साथ दिया है। मुफ्त इलेक्ट्रिक चाक मिलने के बाद मेरठ के कुम्हारों की उत्पादन क्षमता कई गुना बढ़ गई है और इसका सीधा असर उनकी कमाई पर दिखाई दे रहा है।

कुम्हारों के मुताबिक, जहां पहले दिनभर की मशक्कत के बाद सीमित संख्या में दीये तैयार होते थे, वहीं अब कम समय में सैकड़ों डिजाइनर दीये बनाए जा रहे हैं। बढ़ती मांग के चलते कई कुम्हारों की आमदनी करीब पांच गुना तक बढ़ी है।

 

210 से ज्यादा कुम्हारों को मिला इलेक्ट्रिक चाक

 

माटीकला बोर्ड की ओर से वित्तीय वर्ष 2020-21 में शुरू की गई योजना के तहत अब तक मेरठ जिले में 210 से अधिक कुम्हारों को इलेक्ट्रिक चाक दिये जा चुके हैं। करीब 13 से 15 हजार रुपये कीमत का यह चाक बीपीएल परिवारों के कुम्हारों को निशुल्क उपलब्ध कराया जाता है। वर्तमान वित्तीय वर्ष में भी 40 और लोगों को योजना का लाभ देने का लक्ष्य रखा गया है।

 

जहां 50-60 दीये बनते थे, अब 300-400 की रफ्तार

 

गढ़ रोड निवासी कुम्हार सुरेश बताते हैं कि पारंपरिक चाक पर एक निश्चित समय में करीब 50-60 दीये ही तैयार हो पाते थे। हाथ से चाक चलाने में मेहनत भी अधिक लगती थी और उत्पादन भी सीमित रहता था। इलेक्ट्रिक चाक ने पूरा काम बदल दिया। अब उतने ही समय में 300 से 400 तक डिजाइनर दीये तैयार हो जाते हैं। यानी उत्पादन क्षमता करीब छह से सात गुना तक बढ़ गई है। दीपावली के मौसम में जब मिट्टी के दीयों की मांग अचानक बढ़ जाती है, तब यह अतिरिक्त उत्पादन कुम्हार परिवारों के लिए बड़ी राहत साबित हो रहा है।

 

ढाई लाख दीयों का ऑर्डर, एक घंटे में 700 दीये

 

कुम्हार मनोज कुमार के लिए इस बार दीपावली खास है। उन्हें अभी से करीब ढाई लाख दीयों का ऑर्डर मिल चुका है। उनका कहना है कि इलेक्ट्रिक चाक की मदद से अब वह एक घंटे में करीब 700 दीये तैयार कर रहे हैं।

 

मनोज के मुताबिक, मिट्टी के पारंपरिक दीयों और दूसरे मिट्टी उत्पादों के प्रति लोगों का रुझान फिर बढ़ रहा है। बाजार में डिजाइनर दीयों की मांग ने कुम्हारों के लिए कमाई के नए रास्ते खोले हैं। पहले जहां बड़े ऑर्डर पूरे करना मुश्किल होता था, वहीं अब इलेक्ट्रिक चाक के कारण समय पर बड़ी मात्रा में उत्पादन संभव हो गया है।

 

चाक की रफ्तार बढ़ी तो दर्द भी हुआ कम

 

इलेक्ट्रिक चाक ने सिर्फ उत्पादन ही नहीं बढ़ाया, बल्कि कुम्हारों की शारीरिक मेहनत भी कम की है। दीपक प्रजापति बताते हैं कि हाथ से चलने वाले पारंपरिक चाक पर लंबे समय तक काम करना बेहद थकाऊ होता था। लगातार मेहनत के कारण हाथ, कंधे और सीने में दर्द की समस्या रहती थी। परिवार के सदस्य भी ज्यादा देर तक काम नहीं कर पाते थे।

 

अब इलेक्ट्रिक चाक ने काम को आसान कर दिया है। परिवार के सदस्य मिलकर 10 से 12 घंटे तक आसानी से काम कर लेते हैं। इससे ज्यादा उत्पादन हो रहा है और बड़े ऑर्डर भी समय पर पूरे किए जा रहे हैं।

 

बिहारी प्रजापति भी मानते हैं कि आधुनिक तकनीक ने माटीकला को नई गति दी है। उनके लिए इलेक्ट्रिक चाक महज एक मशीन नहीं, बल्कि पारंपरिक हुनर को बाजार की नई जरूरतों से जोड़ने वाला साधन बन गया है।

 

माटीकला में लौट रही रौनक

 

पिछले कुछ वर्षों में मिट्टी के दीयों, बर्तनों और सजावटी उत्पादों की मांग में बढ़ोतरी ने कुम्हारों के चेहरे पर फिर से उम्मीद जगाई है। जिला ग्रामोद्योग अधिकारी मान्या चतुर्वेदी के मुताबिक, सरकार पात्र लोगों को विभिन्न योजनाओं का लाभ देकर माटीकला से जुड़े परिवारों को आर्थिक रूप से मजबूत करने का प्रयास कर रही है। अब सामान्य उपभोक्ता भी मिट्टी के बर्तनों और दीयों को प्राथमिकता देने लगे हैं।

 

सिर्फ प्रजापति समाज नहीं, हर वर्ग के लोग कर सकते हैं आवेदन

 

माटीकला टूल-किट योजना का लाभ केवल प्रजापति समाज तक सीमित नहीं है। किसी भी समाज का इच्छुक व्यक्ति आवेदन कर सकता है। इसके लिए आवेदक का संबंधित जिले का मूल निवासी होना और उसकी उम्र 18 से 55 वर्ष के बीच होना जरूरी है।

 

टूल-किट मिलने से पहले मंडलीय प्रशिक्षण केंद्र पर तीन दिवसीय प्रशिक्षण अनिवार्य है। इसके अलावा परिवार में पहले किसी विभाग या संस्था से माटीकला टूल-किट नहीं मिली होनी चाहिए। आवेदक का माटीकला कारीगर के रूप में पंजीकरण और तहसील स्तर से सत्यापन भी जरूरी है।

 

देश की मिट्टी वही है, हुनर वही है, लेकिन अब चाक की रफ्तार बदल गई है। इलेक्ट्रिक चाक ने मेरठ के कुम्हारों के हाथों को तकनीक की ताकत दी है। यही वजह है कि इस बार दीपावली से पहले उनके आंगन में सिर्फ दीये नहीं, बल्कि बढ़ी हुई आमदनी और बेहतर भविष्य की उम्मीद भी आकार ले रही है।