
निखिल रंजन
जर्मनी में बुजुर्गों और बीमारियों पर होने वाला खर्च बीते साल सामाजिक खर्च के कुल खर्च का करीब 70 फीसदी तक पहुंच गया। इसकी वजह से देश का सोशल बजट रिकॉर्ड ऊंचाई पर चला गया है। ALSO READ: क्या सूखे की मार से जर्मनी में महंगा होगा भोजन?
आईएफओ इंस्टीट्यूट के एक नए विश्लेषण से यह बात पता चली है। इस विश्लेषण की रिपोर्ट सोमवार, 24 अगस्त को प्रकाशित हुई। इस रिपोर्ट के मुताबिक 1992 के बाद से अब तक हुइ खर्चों में बढ़ोतरी का करीब 80 फीसदी हिस्सा बुजुर्गों और बीमारियों पर होने वाला खर्च है।
रिपोर्ट के मुताबिक इस जनसंख्या की संरचना में हो रहे बदलाव प्रवृत्ति के पीछे प्रमुख कारण है। इनकी वजह से कल्याणकारी राज्य में एक पीढ़ी का खर्च दूसरी पीढ़ी तक बहुत ज्यादा पहुंच रहा है।
जीडीपी से ज्यादा तेज गति से बढ़ रहा है सोशल बजट
आईएफओ की रिसर्चर एमिली होएसलिंगर का कहना है, “देश का सोशल बजट जीडीपी की तुलना में ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है। इस वजह से कमजोर अर्थव्यवस्था भी सोशल बजट की हिस्सेदारी बढ़ाने में योगदान दे रही है।”
विश्लेषण के बाद जारी रिपोर्ट के मुताबिक 2019 और 2025 के बीच सामाजिक खर्च में 11.5 फीसदी या 104 अरब की बढ़ोत्तरी हुई। यह आंकड़ा कीमतों के असर को शामिल करने के बाद हासिल हुआ है। इसी अवधि में सोशल बजट की हिस्सेदारी 29.6 फीसदी से बढ़ कर 32 हो गई, जो रिकॉर्ड है।
खर्च में बढ़ोतरी की मुख्य वजह उन बुजुर्गों की बीमारी और देखभाल पर बढ़ता खर्च है, जिनके पास स्वास्थ्य बीमा है। इसके अलावा, संघीय पेंशन व्यवस्था के लिए किए जा रहे भुगतान भी इस वृद्धि का एक प्रमुख कारण हैं। ALSO READ: शरीर के हर अंग को प्रभावित करता है जंगल की आग का धुआं
जर्मनी में क्या है सोशल बजट
जर्मनी में सोशल बजट का मतलब वह धनराशि जो समाज के अलग अलग वर्गों को सहायता के रूप में दी जाती है। इसमें बुजुर्गों को पेंशन से लेकर, स्वास्थ्य बीमा, दीर्घकालिक देखभाल, बेरोजगारी भत्ता, परिवार सहायता, आवास सहायता जैसे खर्चे शामिल हैं। इनके अलावा भी कुछ और खर्चे हैं जो इस धन से किए जाते हैं, मसलन सामाजिक सुरक्षा योजनाएं।
जर्मनी के श्रम और सामाजिक मंत्रालय के मुताबिक 2024 में इस सामाजिक बजट पर कुल 1.345 खरब यूरो खर्च किए गए। यह रकम देश की कुल जीडीपी की करीब 31.2 फीसदी है। हर गुजरते साल के साथ यह रकम बढ़ती जा रही है जबकि उस गति से जीडीपी नहीं बढ़ रही। हालत यह है कि कई सालों से इस बजट के लिए अतिरिक्त धन की व्यवस्था दूसरे स्रोतों से करनी पड़ रही है। ALSO READ: जलवायु परिवर्तन से बचने के लिए जर्मन शहर ने उठाए कदम
किन लोगों तक पहुंचता है सोशल बजट का फायदा
सोशल बजट से बुजुर्गों को पेंशन और सहायता मिलती है। बीमारी, शारीरिक अक्षमता या किसी और वजह से अपना काम कर पाने में असमर्थ लोग भी लंबी समय की देखभाल या फिर दूसरी जरूरतों के लिए इसी बजट से सहायता पाते हैं।
नौकरी छूट जाने या फिर दोबारा रोजगार नहीं मिलने की स्थिति में भी सरकार लोगों की इस बजट से सहायता करती है। जर्मनी में परिवार और बच्चे पालने वाले लोगों को भी कुछ सहायता दी जाती है, इसके लिए भी धन इसी बजट से आता है।
जिन लोगों की आमदनी कम होती है और वो अपना खर्च उठा पाने में सक्षम नहीं होते उनके लिए आवास या फिर इसी तरह की सामाजिक सहायता या फिर सब्सिडी इस बजट के जरिए दी जाती है। ALSO READ: इसराइली मंत्री के “टारगेट किलिंग” वाले बयान पर उबाल
आबादी में बदलाव का असर
जर्मनी दुनिया के उन देशों में है जहां आबादी में वृद्धि बहुत धीमी है या फिर नहीं हो रही है। इसकी वजह से जनसंख्या में बुजुर्गों की हिस्सेदारी बढ़ती जा रही है और युवा कम हो रहे हैं। बुजुर्ग होने के साथ लोगों की काम करने की क्षमता घटती जाती है। काम कम करने या फिर बंद कर देने के बाद उनके लिए पेंशन और दूसरे खर्चों का इंतजाम सामाजिक बजट के जिम्मे आ जाता है।
बच्चे कम पैदा होने की वजह से युवाओं की संख्या कम है ऐसे में इन सब बढ़े खर्चों का बोझ उठाना पड़ता है। यह स्थिति हर गुजरते साल के साथ बिगड़ती जा रही है।
जर्मनी में बीते कई वर्षों से आबादी लगभग स्थिर है। आप्रवासन के जरिए आबादी को घटने से रोकने में कुछ मदद मिली है लेकिन अगर यही हाल रहा तो यह उपाय भी कारगर नहीं रहेगा।


