दिलों को जोड़ने की एक मुहिम: जानिए राजीव गांधी की जयंती और ‘सद्भावना दिवस’ का कनेक्शन

दिलों को जोड़ने की एक मुहिम: जानिए राजीव गांधी की जयंती और 'सद्भावना दिवस' का कनेक्शन

Rajiv Gandhi

Rajiv Gandhi

भांति-भांति के धर्म, अनगिनत भाषाएं और ढेरों बोलियां—भारत की यही सतरंगी विविधता हमारी सबसे बड़ी पहचान है। लेकिन इस विविधता को एक सूत्र में पिरोकर रखना कोई आसान काम नहीं। इसी आपसी भाईचारे, सहिष्णुता और प्रेम के धागे को मजबूत करने के लिए हर साल 20 अगस्त को देश में 'सद्भावना दिवस' मनाया जाता है। यह खास दिन भारत के पूर्व प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी की जयंती की याद में समर्पित है, जिसका एकमात्र मकसद देश के कोने-कोने में अमन, शांति और सौहार्द का संदेश फैलाना है।

 

सद्भावना दिवस का मर्म और इसकी गहराई

इस दिन का बुनियादी फलसफा यही है कि किसी भी मुल्क की तरक्की सिर्फ बड़ी-बड़ी इमारतों या आर्थिक आंकड़ों से नहीं, बल्कि वहां के लोगों के आपसी प्यार और समझ से तय होती है। अगर दिलों में दूरियां और भेदभाव की दीवारें होंगी, तो हर तरक्की अधूरी रह जाएगी।

 

वर्ष 1991 में राजीव गांधी के निधन के बाद, 1992 में कांग्रेस द्वारा 'राजीव गांधी सद्भावना पुरस्कार' की नींव रखी गई। राजीव गांधी का दृढ़ विश्वास था कि देश की असली ताकत उसकी युवा शक्ति है। उनका मानना था कि अगर युवा पीढ़ी को सही दिशा मिले और वे जात-पात या धर्म के बंधनों से ऊपर उठकर केवल इंसानियत के नाते एक-दूसरे को गले लगाएं, तो देश में एक नई सामाजिक क्रांति आ सकती है।

 

क्यों चुना गया राजीव गांधी की जयंती का दिन?

राजीव गांधी ने अपने दौर में भारत को डिजिटल क्रांति, आधुनिक शिक्षा और सूचना तकनीक के रास्ते पर तेजी से आगे बढ़ाया। लेकिन तकनीक के साथ-साथ उनका सबसे ज्यादा जोर इस बात पर था कि एक बहुसांस्कृतिक देश में शांति और भाईचारा हर हाल में कायम रहना चाहिए। उनका साफ मानना था कि हिंसा, वैमनस्य और नफरत किसी भी समस्या का समाधान नहीं हो सकते। उनकी इसी दूरदर्शी और शांतिप्रिय सोच को भावी पीढ़ियों तक पहुंचाने के मकसद से उनकी जयंती को 'सद्भावना दिवस' के रूप में मनाने की परंपरा शुरू हुई।

 

इस दिन क्या-क्या खास होता है?

20 अगस्त को देशभर के सरकारी दफ्तरों, स्कूलों, कॉलेजों और सामाजिक संस्थाओं में एक अलग ही उत्साह देखने को मिलता है:

 

सद्भावना की शपथ: लोग जात-पात और धर्म से ऊपर उठकर समाज में शांति और सौहार्द बनाए रखने का संकल्प लेते हैं।

युवाओं की भागीदारी: स्कूलों-कॉलेजों में निबंध, भाषण और डिबेट कॉम्पिटिशन आयोजित किए जाते हैं ताकि नई पीढ़ी को राष्ट्रीय अखंडता का मतलब समझ आए।

सांस्कृतिक रंग: जगह-जगह ऐसे रंगारंग कार्यक्रम होते हैं जो 'विविधता में एकता' के भारत के मूल मंत्र को बयां करते हैं।

डिजिटल अवेयरनेस: आज के दौर में सोशल मीडिया पर भी भाईचारे और शांति के संदेशों की मुहिम चलाई जाती है।

 

आज के दौर में इसकी अहमियत क्यों बढ़ जाती है?

आज जब छोटी-छोटी बातों पर समाज में बिखराव और दूरियां देखने को मिलती हैं, तब सद्भावना दिवस की प्रासंगिकता और भी ज्यादा गहरी हो जाती है। यह दिन हमें आईना दिखाता है और याद दिलाता है कि भारत का असली वजूद उसकी एकजुटता में है। जब हम हर तरह के भेदभाव को भुलाकर एक भारतीय के रूप में साथ खड़े होते हैं, तभी हमारा देश दुनिया में सीना तानकर आगे बढ़ पाता है।