इस्लामी नाटो : क्या मोदी-नेतान्याहू की नजदीकियों का जवाब देने के लिए साथ आए पाक, सऊदी और तुर्की?

islamic nato pakistan saudi turkey

“नाटो की तर्ज पर 'एक पर हमला, सब पर हमला'। क्या भारत-इजराइल के तकनीकी व सामरिक गठबंधन ने तीन प्रमुख मुस्लिम देशों को एक मंच पर आने के लिए मजबूर कर दिया?”

फरवरी 2026 में भारत और इजराइल द्वारा अपने संबंधों को 'शांति, नवाचार और समृद्धि के लिए विशेष रणनीतिक साझेदारी' (Special Strategic Partnership for Peace, Innovation & Prosperity) के स्तर पर उन्नत करने और जुलाई 2026 में 'द्विपक्षीय निवेश समझौते' (BIA) के लागू होने के ठीक बाद, 7 अगस्त 2026 को पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की ने 'मक्का संयुक्त रक्षा समझौते' पर हस्ताक्षर किए।

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के विश्लेषकों के बीच यह यक्ष प्रश्न तेजी से उठ रहा है: क्या मक्का रक्षा समझौता वास्तव में भारत और इजराइल की बढ़ती नजदीकियों और I2U2/IMEC जैसे पश्चिमी-एशियाई तंत्रों का सीधा जवाब है?

1. दो विपरीत ध्रुवों का उभार : भारत-इजराइल बनाम मक्का समझौता
पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया के संगम पर दो अलग-अलग रणनीतिक गुटों की रूपरेखा स्पष्ट दिखाई देने लगी है:

  1. भारत-इजराइल की गहरी होती धुरी (2026): फरवरी 2026 में भारतीय प्रधानमंत्री की इजराइल यात्रा के दौरान रक्षा प्रौद्योगिकियों के सह-उत्पादन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), सेमीकंडक्टर और 'भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे' (IMEC) को गति देने पर सहमति बनी।
  2. मक्का समझौते का प्रतिसंतुलन (August 2026): इसके जवाब में पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की द्वारा “एक पर हमला, सभी पर हमला” की सामूहिक सुरक्षा गारंटी देना इस क्षेत्र में शक्ति संतुलन (Balance of Power) बनाए रखने की कवायद माना जा रहा है।

2. क्या यह भारत-इजराइल गठबंधन की सीधी प्रतिक्रिया है?
इस सवाल का उत्तर 'हां और ना' दोनों के सूक्ष्म कूटनीतिक संतुलन में छिपा है:
(A) 'हां' – क्यों यह भारत-इजराइल धुरी का जवाब माना जा रहा है?

  • I2U2 और IMEC का विकल्प : भारत, इजराइल, अमेरिका और यूएई का 'I2U2' समूह और IMEC गलियारा तुर्की व पाकिस्तान दोनों को रणनीतिक रूप से दरकिनार करता था। तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन ने IMEC का खुलकर विरोध करते हुए वैकल्पिक व्यापारिक मार्गों पर जोर दिया था। मक्का समझौता तुर्की और पाकिस्तान को पश्चिम एशिया के व्यापारिक व सुरक्षा नेटवर्क के केंद्र में वापस लाता है।
  • पाकिस्तान की सुरक्षा की तलाश : भारत और इजराइल के बीच आधुनिक रक्षा तकनीकों (जैसे राडार, मिसाइल डिफेंस, एयर सर्विलांस) के सह-उत्पादन से पाकिस्तान के खिलाफ भारत की पारंपरिक सैन्य श्रेष्ठता बढ़ी है। पाकिस्तान ने सऊदी की वित्तीय मदद और तुर्की के उन्नत ड्रोन (Bayraktar) व नौसैनिक जहाजों के जरिए इस अंतर को पाटने के लिए मक्का समझौते को जरिया बनाया है।
  • वैश्विक नैरेटिव का मुकाबला : इजराइल-भारत के रक्षा व तकनीकी जुड़ाव के मुकाबले तुर्की खुद को मुस्लिम जगत के तकनीकी और सैन्य नेतृत्वकर्ता के रूप में स्थापित करना चाहता है।

(B) 'ना' – क्यों इसके पीछे केवल भारत-इजराइल कारक ही नहीं है?

  • सऊदी अरब की अपनी सुरक्षा मजबूरी : सऊदी अरब का प्राथमिक उद्देश्य भारत-इजराइल गठबंधन का विरोध करना नहीं, बल्कि अमेरिकी सुरक्षा छतरी पर अपनी पूर्ण निर्भरता को कम करना है। ईरान, लाल सागर में हुती विद्रोहियों के ड्रोन हमलों और क्षेत्रीय अस्थिरता से निपटने के लिए सऊदी अरब को अपनी सुरक्षा प्रणाली को बहुकोणीय बनाना जरूरी था।
  • रियाद के भारत से आर्थिक हित : सऊदी अरब भारत को अपना प्रमुख ऊर्जा ग्राहक और बड़ा निवेश बाजार मानता है। यही कारण है कि सऊदी अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि यह रक्षा समझौता केवल रक्षात्मक प्रकृति का है और यह भारत जैसे मित्र देशों के साथ उसके संबंधों को प्रभावित नहीं करेगा।

3. दोनों गठबंधनों का संरचनात्मक तुलनात्मक अध्ययन

islamic nato pakistan saudi turkey

4. नई दिल्ली का रुख और भविष्य की रणनीति

भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) ने स्पष्ट किया है कि भारत क्षेत्रीय भू-राजनीतिक घटनाक्रमों और 'मक्का संयुक्त रक्षा समझौते' पर पैनी नजर रख रहा है। भारत की विदेश नीति किसी एक गुटबंदी में बांधने के बजाय 'गुटनिरपेक्षता से रणनीतिक स्वायत्तता' (Strategic Autonomy) पर केंद्रित है:

  1. सऊदी अरब और खाड़ी देशों से संवाद : भारत अपने विशाल आर्थिक आकार, कार्यबल (Diaspora) और ऊर्जा व्यापार के बल पर सऊदी अरब व यूएई के साथ मजबूत संबंध बनाए रखेगा ताकि इस समझौते का इस्तेमाल भारत-विरोधी मोर्चे के रूप में न हो सके।
  2. वैकल्पिक रक्षा साझेदारियां : तुर्की के पाकिस्तान-सऊदी गुट में हावी होने के जवाब में भारत ने भूमध्य सागर में ग्रीस, साइप्रस और मध्य पूर्व में इजराइल व यूएई के साथ अपने सुरक्षा व नौसैनिक संबंधों को और गहरा किया है।
  3. आत्मनिर्भरता और सह-विकास : इजराइल के साथ 2026 के समझौते के तहत 'मेक इन इंडिया' के तहत क्रिटिकल एंड इमर्जिंग टेक्नोलॉजी (CET) में भारत अपनी स्वदेशी सैन्य क्षमताओं को और तेज कर रहा है।

यह कहना पूरी तरह सटीक नहीं होगा कि 'मक्का रक्षा समझौता 2026' केवल  भारत और इजराइल की नजदीकियों की प्रतिक्रिया में बना है। हालांकि, यह निर्विवाद है कि भारत-इजराइल के बीच 2026 में बने गहरे तकनीकी व सामरिक ढांचे ने पश्चिम एशिया में शक्ति-संतुलन की जो नई रेखाएं खींची थीं, 'मक्का समझौते' ने उस संतुलन को बनाए रखने के लिए एक समानांतर ब्लॉक खड़ा कर दिया है। भारत के लिए चुनौती यह होगी कि वह इजराइल के साथ अपनी रक्षा-तकनीकी साझेदारी को बिना प्रभावित किए सऊदी अरब जैसे खाड़ी देशों के साथ अपने आर्थिक व ऊर्जा संबंधों को मजबूती से बनाए रखे।