1971 युद्ध का वो ‘संत’, जिसके नाम से कांपती थी पाकिस्तानी टैंक रेजिमेंट : पढ़िए महावीर चक्र विजेता लेफ्टिनेंट जनरल हनूत सिंह की शौर्य गाथा

1971 युद्ध का वो 'संत', जिसके नाम से कांपती थी पाकिस्तानी टैंक रेजिमेंट : पढ़िए महावीर चक्र विजेता लेफ्टिनेंट जनरल हनूत सिंह की शौर्य गाथा

Hanut Singh Battle of Basantar 1971: 15 अगस्त का यह पावन अवसर न केवल भारत की आजादी का उत्सव मनाने का दिन है, बल्कि उन वीर सपूतों को नमन करने का क्षण भी है जिनकी बदौलत हमारी सीमाएं सुरक्षित हैं। भारतीय सेना का इतिहास अदम्य साहस, असाधारण शौर्य और बलिदान की अनगिनत कहानियों से भरा पड़ा है। ऐसी ही एक अमर गाथा है लेफ्टिनेंट जनरल हनूत सिंह की—जिन्हें भारतीय सेना का सबसे बेहतरीन 'आर्मर्ड कमांडर' माना जाता है। 

 

सेना में उनके साथी और अधीनस्थ उन्हें प्यार और सम्मान से “हनूत साहब”, उनके आध्यात्मिक झुकाव के कारण “द सेंट” (The Saint) और उनकी शांत कार्यशैली की वजह से “खामोश जनरल” कहकर पुकारते थे।

शाही परंपरा से रणजीत मैदान तक का सफर

हनूत सिंह का जन्म राजस्थान के बाड़मेर जिले के ऐतिहासिक जसोल गांव में 6 जुलाई 1933 को हुआ था। उनका निधन देहरादून में 10 अप्रैल 2015 को ध्‍यान/समाधि के दौरान हुआ था।  वे प्रसिद्ध 'राठौड़' राजपूत वंश से ताल्लुक रखते थे और पूर्व केंद्रीय मंत्री जसवंत सिंह के चचेरे भाई थे।

 

रगों में बहते राजपूती खून और मातृभूमि की रक्षा के संकल्प के साथ उन्होंने भारतीय सेना में प्रवेश किया और अपनी अद्वितीय प्रतिभा व योग्यता के बल पर 17 पूना हॉर्स (17 Poona Horse) रेजिमेंट की कमान संभाली।

1971 बसंतर की लड़ाई : रणनीतिक चक्रव्यूह को भेदना

1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान बसंतर नदी का युद्ध (Battle of Basantar) भारतीय सैन्य इतिहास की सबसे भीषण और निर्णायक टैंक लड़ाइयों में से एक माना जाता है। उस समय तत्कालीक लेफ्टिनेंट कर्नल के पद पर तैनात हनूत सिंह 17 पूना हॉर्स की कमान संभाल रहे थे।

 

पाकिस्तानी सेना ने बसंतर नदी के आसपास भारी बारूदी सुरंगें (Minefields) बिछा रखी थीं और उनके पास अत्याधुनिक व शक्तिशाली पैटन टैंकों का काफिला था। दुश्मन का इरादा भारतीय बढ़त को रोकना था। लेकिन हनूत सिंह की रणनीति और अदम्य साहस के आगे दुश्मन का हर चक्रव्यूह धराशायी हो गया। उन्होंने बिना किसी डर के अपनी रेजिमेंट का नेतृत्व करते हुए माइन्स बिछे क्षेत्र को पार किया और दुश्मन के क्षेत्र में गहराई तक प्रवेश कर गए।

48 पाकिस्तानी टैंकों का विनाश और अरुण खेत्रपाल की शहादत

  • दुश्मन के टैंकों का सफाया : हनूत सिंह के कुशल और आक्रामक नेतृत्व में पूना हॉर्स ने पाकिस्तान के लगभग 48 शक्तिशाली टैंकों को तबाह कर दिया।
  • परमवीर चक्र विजेता से जुड़ाव : इसी ऐतिहासिक लड़ाई में भारत के सबसे युवा परमवीर चक्र विजेता सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल ने भी हनूत सिंह के ही ओजस्वी नेतृत्व और मार्गदर्शन में अभूतपूर्व वीरता का परिचय देते हुए देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया था।
  • अद्वितीय संयम और नेतृत्व : युद्ध के मैदान में जब चारों तरफ गोले और गोलियां बरस रही थीं, तब भी 'हनूत साहब' पूरी तरह शांत रहकर अपने वायरलेस सेट पर सटीक निर्देश देते थे। उनके इस अकल्पनीय संयम से जवानों का हौसला कई गुना बढ़ जाता था।

'महावीर चक्र' से सम्मान और अटूट विश्वास

हनूत सिंह के अदम्य साहस, शांत नेतृत्व और असाधारण सामरिक सूझबूझ के लिए उन्हें देश के दूसरे सबसे बड़े वीरता पुरस्कार 'महावीर चक्र' (MVC) से सम्मानित किया गया।

 

एक कमांडर के रूप में वे हमेशा अपने सैनिकों के साथ सबसे आगे खड़े रहते थे। जवानों के दिल में उनके प्रति ऐसा अटूट विश्वास था कि अगर 'हनूत साहब' नेतृत्व कर रहे हैं, तो विजय निश्चित है।

टैंक युद्धकला के महान गुरु

टैंक युद्धकला (Armoured Warfare) पर हनूत सिंह की पकड़ इतनी मजबूत और वैज्ञानिक थी कि उनके द्वारा तैयार की गई रणनीतियों और युद्ध की बारीकियों को आज भी भारतीय और अंतरराष्ट्रीय सैन्य अकादमियों में केस स्टडी के रूप में पढ़ाया जाता है।

 

युद्ध के मैदान में एक निष्णात योद्धा और निजी जीवन में एक संत जैसी त्यागमयी जीवनशैली जीने वाले ले. जनरल हनूत सिंह भारतीय सेना के अनुशासन, रणनीति और शौर्य के अमर प्रतीक हैं। इस 80वें स्वतंत्रता दिवस पर, आइए हम भारत मां के इस महान सपूत और देश के लिए बलिदान देने वाले सभी वीरों को शत-शत नमन करें।

 

जय हिंद! जय भारत!