
केंद्र सरकार ने नकली और घटिया दवाओं पर अंकुश लगाने के लिए क्यूआर कोड आधारित प्रणाली का दायरा बढ़ा दिया है। इसमें सभी तरह के टीके, एंटीबायोटिक दवाएं, कैंसर रोधी दवाएं और नशा उन्मूलन से जुड़ी शेड्यूल H2 की दवाएं शामिल की गई हैं। दवाओं की पैकेजिंग पर क्यूआर कोड होने से उसकी प्रामाणिकता की जांच और सत्यापन आसान होगा। इससे लोग यह जान सकेंगे कि जिस दवा का सेवन कर रहे हैं, वह घटिया या नकली तो नहीं है। ALSO READ: Passport : 1 जुलाई से पासपोर्ट बनवाना होगा महंगा! केंद्र सरकार ने बढ़ाई फीस, जानिए नई दरें
केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने वैक्सीन, एंटीबायोटिक दवा और कैंसर की दवाओं पर QR कोड अनिवार्य कर दिया है। दवा कहां बनी, कैसे बनी सब कुछ एक क्लिक में पता चल सकेगा। स्वास्थ्य मंत्रालय ने इसके लिए औषधि नियम 1945 में संशोधन को अधिसूचित किया है। इससे क्यूआर कोड स्कैन करते ही देश में बनीं दवाइयों की पूरी जानकारी सामने आ जाएगी।
कहां लगेगा क्यूआर कोड
शेड्यूल H2 के तहत निर्धारित दवाओं की पैकेजिंग पर बारकोड या क्यूआर कोड लगाना अनिवार्य होगा, ताकि पूरी आपूर्ति श्रृंखला में उनकी प्रामाणिकता की जांच और ट्रैकिंग की जा सके।
संशोधन के बाद इन दवाओं के निर्माताओं को उत्पाद की प्राथमिक पैकेजिंग पर बारकोड या क्यूआर कोड प्रिंट या चिपकाना होगा। यदि प्राथमिक पैकेजिंग पर पर्याप्त जगह उपलब्ध नहीं है, तो इसे सेकंडरी पैकेजिंग पर लगाया जाएगा। क्यूआर कोड में ऐसी जानकारी होगी, जिसे किसी भी अधिकृत सॉफ्टवेयर एप्लिकेशन के जरिए स्कैन कर दवा की असलियत और पूरी आपूर्ति श्रृंखला में उसकी स्थिति की पुष्टि की जा सकेगी। ALSO READ: LPG को लेकर आई बड़ी खुशखबरी, सरकार ने दी बड़ी राहत
मिलेगी दवा से जुड़ी 9 महत्वपूर्ण जानकारी
हर क्यूआर कोड में दवा से जुड़ी नौ महत्वपूर्ण जानकारियां दर्ज होंगी। इनमें उत्पाद की विशिष्ट पहचान संख्या (Unique Product Identification Code), दवा का सामान्य और जेनेरिक नाम, ब्रांड नाम, निर्माता का नाम और पता, बैच नंबर, निर्माण तिथि, समाप्ति तिथि (Expiry Date), मैन्युफैक्चरिंग लाइसेंस नंबर तथा दवा में प्रयुक्त सहायक पदार्थों (Excipients) का विवरण शामिल होगा। इससे डिजिटल माध्यम से दवाओं की जांच, सत्यापन और ट्रैकिंग पहले से कहीं अधिक आसान हो जाएगी।
क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?
अब तक यह व्यवस्था केवल देश के शीर्ष 300 दवा ब्रांडों पर लागू थी। नए संशोधन के बाद इसका दायरा बढ़ाकर सभी टीकों, एंटीमाइक्रोबियल दवाओं, कैंसर रोधी दवाओं तथा नारकोटिक एवं साइकोट्रॉपिक दवाओं तक कर दिया गया है। इससे नकली और घटिया दवाओं के बाजार में पहुंचने पर प्रभावी रोक लगाने में मदद मिलेगी।
नई ट्रेसबिलिटी प्रणाली के माध्यम से आपूर्ति श्रृंखला के विभिन्न चरणों पर दवाओं की प्रामाणिकता की पुष्टि की जा सकेगी तथा उनकी बेहतर निगरानी और सत्यापन संभव होगा। इससे नियामकीय निगरानी मजबूत होगी और नकली एवं घटिया दवाओं के वितरण पर अंकुश लगाने में सहायता मिलेगी। साथ ही, यह एंटी-माइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) से लड़ाई में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी, क्योंकि नकली और निम्न गुणवत्ता वाली एंटीमाइक्रोबियल दवाओं की पहचान और निगरानी आसान हो जाएगी। ALSO READ: Passport : क्या पासपोर्ट भी नागरिकता का सबूत नहीं? जानिए भारत में कौन-से दस्तावेज साबित करते हैं आपकी पहचान
कबसे लागू होना यह फैसला?
उद्योग और अन्य संबंधित पक्षों को पर्याप्त समय देने के लिए मंत्रालय ने इन नियमों को चरणबद्ध तरीके से लागू करने का निर्णय लिया है। टीकों, नारकोटिक एवं साइकोट्रॉपिक दवाओं तथा कैंसर रोधी दवाओं के लिए यह नियम 1 जुलाई 2027 से लागू होंगे। वहीं एंटीमाइक्रोबियल दवाओं के लिए यह व्यवस्था 1 जुलाई 2028 से प्रभावी होगी। मंत्रालय ने दवा निर्माताओं को निर्धारित समयसीमा से पहले ही स्वैच्छिक रूप से इस व्यवस्था को अपनाने के लिए भी प्रोत्साहित किया है, ताकि दवाओं की प्रामाणिकता, ट्रेसबिलिटी और आपूर्ति श्रृंखला में पारदर्शिता के लाभ जल्द मिल सकें।
यह पहल दवाओं और चिकित्सा उत्पादों के नियामकीय ढांचे को मजबूत करने, फार्मास्यूटिकल आपूर्ति श्रृंखला में पारदर्शिता बढ़ाने और वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य की सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में सरकार के निरंतर प्रयासों का हिस्सा है। साथ ही, यह अभियान “नशा मुक्त भारत” के लक्ष्य को आगे बढ़ाने में भी सहायक साबित होगा।
edited by : Nrapendra Gupta

