Muharram 2026: मुहर्रम की 10वीं तारीख क्यों है खास? जानिए यौम-ए-आशूरा की पूरी कहानी

A depiction of the historical event observed on Youm-e-Ashura during the month of Muharram

Martyrdom of Imam Hussain: मोहर्रम/ मुहर्रम इस्लामिक कैलेंडर (हिजरी सन) का पहला महीना है, और इस महीने की 10वीं तारीख को 'यौम-ए-आशूरा' (Yoom-e-Ashura) कहा जाता है। यह दिन पूरी दुनिया के मुसलमानों, विशेषकर शिया समुदाय के लिए बेहद भावुक, ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण है। यह दिन विशेष रूप से इमाम हुसैन और उनके साथियों की कर्बला में दी गई महान शहादत की याद दिलाता है। यह कोई खुशी या जश्न का त्योहार नहीं है, बल्कि यह शहादत, हक (सच्चाई) और सब्र (धैर्य) का प्रतीक है।ALSO READ: Muharram month 2026: मोहर्रम मास का इस्लाम धर्म में महत्व और परंपरा जानें

 

आइए जानते हैं कि यह दिन इतना खास क्यों है और इसकी पूरी कहानी क्या है…

 

यौम-ए-आशूरा की ऐतिहासिक कहानी (कर्बला का युद्ध)

यौम-ए-आशूरा का सीधा संबंध आज से लगभग 1400 साल पहले इराक के 'कर्बला' के मैदान में हुई एक ऐतिहासिक और दर्दनाक घटना से है। यह कहानी है इस्लाम के आखिरी नबी (पैगंबर) हजरत मोहम्मद साहब के नवासे (नाती) हजरत इमाम हुसैन की।

 

1. यजीद का जुल्म और इमाम हुसैन का इंकार

उस दौर में सीरिया का शासक यजीद था, जो एक क्रूर, अत्याचारी और भ्रष्ट राजा था। वह खुद को खलीफा/ इस्लामिक शासक घोषित कर चुका था और चाहता था कि इमाम हुसैन उसके शासन और उसकी गलत नीतियों को अपनी मान्यता दे दें।

 

इमाम हुसैन जानते थे कि अगर उन्होंने यजीद के सामने सिर झुका दिया, तो इस्लाम के मूल सिद्धांत- न्याय, दया और सच्चाई हमेशा के लिए खत्म हो जाएंगे। इसलिए उन्होंने यजीद की अधीनता स्वीकार करने से साफ इंकार कर दिया।

 

2. कर्बला की घेराबंदी

यजीद के अत्याचारों से बचने और शांति बनाए रखने के लिए इमाम हुसैन अपने परिवार- जिसमें छोटे बच्चे और महिलाएं शामिल थीं और कुछ वफादार साथियों के साथ मदीना छोड़ चुके थे। सफर के दौरान यजीद की विशाल फौज ने उन्हें इराक के कर्बला के तपते रेगिस्तान में घेर लिया।

 

पानी पर रोक: मुहर्रम की 7वीं तारीख को यजीद की फौज ने इमाम हुसैन के खेमे के लिए फरात नदी का पानी बंद कर दिया। तपती धूप, भूख और भयंकर प्यास के बावजूद इमाम हुसैन और उनके साथियों ने यजीद के क्रूर शासन के आगे घुटने नहीं टेके।

 

3. 10वें मुहर्रम की महा-शहादत (आशूरा)

मुहर्रम की 10वीं तारीख को यजीद की हजारों की सेना और इमाम हुसैन के महज 72 साथियों के बीच युद्ध हुआ। यह युद्ध सत्ता के लिए नहीं, बल्कि सिद्धांतों की रक्षा के लिए था।

 

एक-एक करके इमाम हुसैन के भाई, बेटे, भतीजे और साथी शहीद होते गए। यहां तक कि उनके 6 महीने के मासूम बेटे हजरत अली असगर को भी यजीद की फौज ने प्यासा ही तीर से शहीद कर दिया। अंत में, 10वें मुहर्रम के दिन अस्र (शाम) की नमाज के वक्त इमाम हुसैन का भी बेरहमी से कत्ल कर दिया गया।

 

कहावत है: 'कत्ल-ए-हुसैन असल में मर्ग-ए-यजीद है, इस्लाम जिंदा होता है हर करबला के बाद।'

– अर्थात: हुसैन की शहादत ने यजीद के क्रूर तंत्र को हमेशा के लिए वैचारिक रूप से मार दिया और इस्लाम के सच्चे मूल्यों को जीवित रखा।

 

अस्वीकरण (Disclaimer) : चिकित्सा, स्वास्थ्य संबंधी नुस्खे, योग, धर्म, ज्योतिष, इतिहास, पुराण आदि विषयों पर वेबदुनिया में प्रकाशित/प्रसारित वीडियो, आलेख एवं समाचार सिर्फ आपकी जानकारी के लिए हैं, जो विभिन्न सोर्स से लिए जाते हैं। इनसे संबंधित सत्यता की पुष्टि वेबदुनिया नहीं करता है। सेहत या ज्योतिष संबंधी किसी भी प्रयोग से पहले विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें। इस कंटेंट को जनरुचि को ध्यान में रखकर यहां प्रस्तुत किया गया है जिसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।ALSO READ: Muharram 2026: कब से शुरू हो रहा है मोहर्रम मास, जानें सही डेट