अब जवान लाशें ढोते-ढोते थक गया है देश, किस काम का ऐसा सिस्टम, जो हमारे बच्चों को बचा न सके?

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पापा… प्लीज मुझे बचा लो…” यह सिर्फ एक बेटे की आखिरी पुकार नहीं थी। यह उस भारत की चीख थी, जो हर कुछ महीनों में अपने युवाओं को किसी न किसी लापरवाही, भ्रष्टाचार और सिस्टम की नाकामी की आग में खो देता है।

लखनऊ के अग्निकांड में जब 23 वर्षीय गेम डिजाइनर सुखमनी सिंह ने अपने पिता को फोन किया—”पापा, मुझे बचा लो” तब वह सिर्फ अपने लिए मदद नहीं मांग रहा था। वह उस व्यवस्था से सवाल कर रहा था, जो इमारतों को मंजूरी तो देती है, लेकिन निकास द्वारों की जांच नहीं करती; जो फायर एनओसी जारी तो करती है, लेकिन यह नहीं देखती कि आपातकाल में लोग बाहर निकल भी पाएंगे या नहीं।

उसके कुछ मिनट बाद फोन कट गया।
और फिर हमेशा की तरह शुरू हुआ वही राष्ट्रीय अनुष्ठान—मुआवजे की घोषणा, जांच समिति, अधिकारियों का निलंबन, टीवी डिबेट और सोशल मीडिया पर श्रद्धांजलि।

लेकिन सवाल वही रह गयाक्या हमारे बच्चों की जिंदगी की कीमत सिर्फ एक प्रेस कॉन्फ्रेंस, जांच समिति और पांच लाख रुपये है?

हर हादसे के बाद हम भूल क्यों जाते हैं?
लखनऊ कोई पहली त्रासदी नहीं है। 2019 में सूरत के कोचिंग सेंटर में लगी आग में 22 छात्रों की मौत हुई थी। कुछ बच्चों ने जान बचाने के लिए चौथी मंजिल से छलांग लगा दी थी। पूरे देश ने वह भयावह दृश्य देखा था।
2024 में राजकोट के गेमिंग जोन में आग लगी। 27 लोग जिंदा जल गए, जिनमें कई बच्चे शामिल थे। दिल्ली के उपहार सिनेमा कांड से लेकर मुंबई के कमला मिल्स अग्निकांड तक, अस्पतालों से लेकर कोचिंग सेंटरों तक, हम एक ही कहानी बार-बार पढ़ते हैं।
•     अवैध निर्माण।
•     बंद आपातकालीन निकास।
•     फर्जी या कागजी फायर एनओसी।
•     और हादसे के बाद जिम्मेदारी का पिंग-पोंग।
•     हर बार सरकारें कहती हैं—”दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।”
 
लेकिन सच्चाई यह है कि दोषी अक्सर बच जाते हैं और मरने वाले हमेशा आम नागरिक होते हैं।
भारत में मौतें प्राकृतिक नहीं, प्रशासनिक होती जा रही हैं
यह कहना कठोर लग सकता है, लेकिन आज भारत में होने वाली कई सामूहिक मौतें दुर्घटनाएं नहीं, बल्कि “प्रशासनिक हत्याएं” हैं।
जब किसी इमारत में लोगों के निकलने का रास्ता नहीं होता, तो आग नहीं मारती—लापरवाही मारती है। जब फायर ऑडिट सिर्फ फाइलों में होता है, तो धुआं नहीं मारता—भ्रष्टाचार मारता है।
जब राहत और बचाव में हर मिनट कीमती होता है और फैसले लेने में घंटों लग जाते हैं, तो ऑक्सीजन की कमी नहीं, बल्कि अक्षमता जान लेती है। लखनऊ के पीड़ितों के परिजनों का आरोप है कि यदि दीवार पहले तोड़ी जाती, तो कई जानें बच सकती थीं।

कल्पना कीजिए उस क्षण की।
एक तरफ परिजन फोन पर मौत से जूझ रहे अपने बच्चों से बात कर रहे थे। दूसरी तरफ प्रशासन निर्णय लेने में व्यस्त था। और बीच में समय खत्म हो रहा था।

युवाओं का देश या युवाओं का कब्रिस्तान?
•     हम दुनिया को बताते हैं कि भारत सबसे युवा देशों में से एक है।
•     हम “डेमोग्राफिक डिविडेंड” की बात करते हैं।
•     हम स्टार्टअप, डिजिटल इंडिया, एआई और पांच ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था के सपने दिखाते हैं।
•     लेकिन क्या हम यह सुनिश्चित कर पाए हैं कि हमारे युवा सुबह घर से निकलें और शाम को सुरक्षित लौट आएं?
•     अगर एक ग्राफिक्स ट्रेनिंग सेंटर, एक कोचिंग क्लास, एक गेमिंग जोन या एक अस्पताल तक सुरक्षित नहीं है, तो फिर विकास के इन दावों का अर्थ क्या है?
किसी भी राष्ट्र की असली प्रगति उसके जीडीपी से नहीं, बल्कि इस बात से मापी जाती है कि वह अपने नागरिकों की जान की कितनी रक्षा कर पाता है।

जांच नहीं, जवाबदेही चाहिए
समस्या यह नहीं है कि हादसे क्यों हो रहे हैं। समस्या यह है कि हादसों के बाद भी कुछ नहीं बदलता। हर त्रासदी के बाद एक जांच समिति बनती है। रिपोर्ट आती है। फाइल बंद हो जाती है। फिर अगला हादसा हो जाता है। देश को अब जांच समितियों की नहीं, जवाबदेही की जरूरत है।
ऐसी जवाबदेही जिसमें:
•     फर्जी एनओसी देने वाले अधिकारी जेल जाएं।
•     अवैध निर्माण करने वाले मालिकों की संपत्ति जब्त हो।
•     सुरक्षा नियमों की अनदेखी को गैर-इरादतन हत्या नहीं, गंभीर आपराधिक अपराध माना जाए।
•     हर सार्वजनिक भवन का वार्षिक सुरक्षा ऑडिट सार्वजनिक किया जाए।
जब तक लापरवाही की कीमत मौत नहीं, बल्कि जेल और आर्थिक विनाश नहीं बनेगी, तब तक कुछ नहीं बदलेगा।
मुआवजा न्याय नहीं होता
हर हादसे के बाद सरकारें मुआवजे की घोषणा करती हैं। लेकिन क्या किसी पिता के लिए उसके बेटे की कीमत पांच लाख, दस लाख या पच्चीस लाख रुपये हो सकती है?
क्या किसी मां को यह सांत्वना मिल सकती है कि उसका बच्चा तो चला गया, लेकिन सरकार ने सहायता राशि दे दी?
मुआवजा राहत हो सकता है। न्याय नहीं।
•      न्याय तब होगा जब जिम्मेदार लोग व्यक्तिगत रूप से जवाबदेह होंगे।
•      न्याय तब होगा जब किसी अधिकारी को यह डर होगा कि उसकी एक लापरवाही उसे जेल पहुंचा सकती है।
•      न्याय तब होगा जब सुरक्षा नियमों की अनदेखी आर्थिक अपराध नहीं, सामाजिक अपराध मानी जाएगी।
युवा भारत की सबसे बड़ी पूंजी हैं, फिर भी सबसे असुरक्षित क्यों?

देश का हर राजनीतिक दल युवाओं की बात करता है। हर बजट में युवाओं का जिक्र होता है। हर चुनाव में युवाओं के सपने बेचे जाते हैं।
लेकिन जब कोई युवा नौकरी सीखने, पढ़ने, ट्रेनिंग लेने या काम करने जाता है, तो क्या हम उसकी सुरक्षा की गारंटी दे सकते हैं?
नहीं।
यही सबसे बड़ा विरोधाभास है। हम दुनिया को बताते हैं कि भारत का भविष्य उसके युवा हैं। लेकिन व्यवहार में हम उन्हें ऐसी इमारतों, संस्थानों और व्यवस्थाओं के हवाले कर देते हैं जो कभी भी उनकी कब्र बन सकती हैं।
हमें जांच आयोग नहीं, राष्ट्रीय शर्म की जरूरत है
भारत में हर त्रासदी के बाद एक परिचित पटकथा चलती है—
जांच समिति।
निलंबन।
मुआवजा।
राजनीतिक बयान।
और फिर विस्मृति।
हम भूल जाते हैं।
सिस्टम बच जाता है।

और अगली त्रासदी का इंतजार शुरू हो जाता है। शायद समस्या यह नहीं कि हादसे हो रहे हैं। समस्या यह है कि हमने हादसों को सामान्य मान लिया है।
हमारे भीतर का आक्रोश कम हो गया है। हम अब मौतों की संख्या गिनते हैं, कारण नहीं। हम शोक मनाते हैं, परिवर्तन की मांग नहीं करते।
आखिरी सवाल
कल्पना कीजिए उस पिता की, जिसने अपने बेटे की आखिरी आवाज सुनी—
“पापा, मुझे बचा लो…”
उस क्षण उस पिता को सरकार याद नहीं आई होगी।
न कानून।
न राजनीति।
न विकास।

उसे सिर्फ यह उम्मीद रही होगी कि कोई व्यवस्था होगी जो उसके बच्चे को बचा लेगी।
लेकिन वह व्यवस्था नहीं आई।
और यही इस पूरे प्रकरण का सबसे भयावह सच है। किसी भी सभ्य राष्ट्र की पहचान उसके स्मारकों, एक्सप्रेसवे, जीडीपी या चुनावों से नहीं होती।
उसकी पहचान इस बात से होती है कि संकट की घड़ी में वह अपने सबसे कमजोर नागरिक को बचा पाता है या नहीं। अगर हम अपने युवाओं को सुरक्षित नहीं रख सकते, तो हमें यह स्वीकार करने का साहस भी रखना चाहिए कि हम विकासशील अर्थव्यवस्था तो बन रहे हैं, लेकिन अभी तक एक जिम्मेदार समाज नहीं बन पाए हैं।
और तब तक, हर अग्निकांड, हर भगदड़, हर ढही हुई इमारत और हर दम घुटती हुई मौत हमसे एक ही सवाल पूछती रहेगी— क्या भारत दुनिया की महाशक्ति बनने से पहले अपने बच्चों को बचाने वाला राष्ट्र बन पाएगा?