
दोपहर 12 बजे इंदौर के महाराजा यशवंतराव (MYH) अस्पताल की कैजुअल्टी के बाहर एम्बुलेंस के सायरन की आवाज थमने का नाम नहीं लेती। धार के ग्रामीण इलाके से आई 28 वर्षीय सीता बाई गंभीर प्रसव पीड़ा में हैं। परिजन पिछले तीन घंटे से 150 किलोमीटर दूर से एम्बुलेंस में भटकते हुए पहुंचे हैं, क्योंकि जिला अस्पताल में ऑक्सीजन और विशेषज्ञ डॉक्टर नहीं थे।
MYH पहुंचने पर उन्हें जो मिला, वह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार और गरिमा) का सीधा उल्लंघन है—एक ही बेड पर दो महिलाएं दर्द से कराह रही थीं, और कुछ मरीज कॉरिडोर की ठंडी टाइलों पर अपनी गंदी चादर बिछाकर बोतल चढ़वाने को मजबूर थे।
दरअसल, इंदौर का एमवाय अस्तपाल इस सूबे का इकलौता बड़ा अस्पताल है, मालवा से लेकर निमाड़ तक के मरीज इस अस्पताल पर निर्भर हैं। आलम यह है कि मालवा-निमाड़ के अस्पतालों से रोजाना सैंकड़ों मरीजों को रेफर किया जाता है। ऐसे में एमवाय पर लगातार दबाव बढता है, जिसका नतीजा यह होता है कि मरीज को बेहतर इलाज नहीं मिल पाता है, इसके उलट मरीज और डॉक्टरों के बीच लगातार विवाद और टकराव की घटनाएं सामने आती हैं।
महात्मा गांधी मेडिकल कॉलेज (एमजीएम) इंदौर के पूर्व डीन डॉ संजय दीक्षित बताते हैं कि हां, यह सही है। जिला अस्पतालों से अक्सर मरीजों को एमवाय रेफर किया जाता है, क्योंकि उनके पास भी संसाधन नहीं है या विशेषज्ञ डॉक्टर उनके पास नहीं होते हैं। ऐसे में एमवाय पर मरीजों का बोझ ज्याद हो जाता है। ऐसे में यहां मरीज के स्वास्थ्य के साथ समझौता करना मजबूरी हो जाता है। जब यह दबाव बढ़ता है तो मरीज की हेल्थ प्रभावित होने से लेकर मरीज की मौत तक का ग्राफ बढ़ता है और फिर मरीज और डॉक्टर के बीच टकराव बढ़ते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि मरीज को स्वास्थ्य का अधिकार नहीं मिल पाता है। ऐसे मामलों में ज्यादातर वही लोग प्रभावित होते हैं जो वंचित वर्ग के होते हैं और ग्रामीण इलाकों से रेफर कि जाते हैं। डॉ संजय दीक्षित बताते हैं कि सरकार को जिला अस्पतालों को ज्यादा रिस्पॉन्सिबल बनाना चाहिए, क्योंकि ज्यादातर नेशनल हेल्थ मिशन से मिला फंड इन्हीं जिला अस्पतालों, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और हेल्थ सेंटर्स को जाता है। मेडिकल कॉलेजों को सरकार से किसी तरह का सीधा फंड नहीं मिलता है।
'रेफरल सिस्टम' की विफलता और MYH पर बेकाबू बोझ
मध्य भारत के सबसे बड़े इस 1400 से अधिक बेड वाले सरकारी अस्पताल की क्षमता अब दम तोड़ रही है। झाबुआ, खरगोन, खंडवा, देवास और बड़वानी जैसे जिलों से प्राथमिक व सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHC/CHC) द्वारा प्राथमिक इलाज दिए बिना ही मरीजों को सीधे 'रेफर' कर दिया जाता है।
- एक बेड पर दो-दो मरीज: बर्न यूनिट, पीडियाट्रिक और मेडिसिन वार्डों में स्थिति सबसे गंभीर है। 100% से अधिक ऑक्यूपेंसी के कारण एक बेड पर दो मरीजों को सुलाया जाता है।
- वेंटीलेटर और स्ट्रेचर की मारामारी: गंभीर रूप से बीमार मरीजों के परिजनों को खुद स्ट्रेचर खींचते या आईसीयू में खाली वेंटीलेटर के लिए घंटों मिन्नतें करते देखा जा सकता है।
डॉक्टरों और मरीजों के बीच तनाव और हिंसक टकराव
अत्यधिक दबाव और संसाधनों की कमी का सीधा असर डॉक्टर-मरीज के रिश्तों पर पड़ रहा है। MYH में रेजिडेंट डॉक्टर प्रतिदिन 16-18 घंटे की ड्यूटी करते हैं।
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केस 1 (कैजुअल्टी में झड़प): धार से आए एक गंभीर मरीज की समय पर वेंटिलेटर न मिलने से मौत के बाद परिजनों ने जूनियर डॉक्टरों पर लापरवाही का आरोप लगाकर तोड़फोड़ की। सुरक्षा में तैनात गार्ड स्थिति को नियंत्रित नहीं कर पाए और डॉक्टरों ने हड़ताल की चेतावनी दे दी।
- केस 2 (ओपीडी में डॉक्टरों से अभद्रता): मेडिसिन ओपीडी में एक डॉक्टर प्रतिदिन 300 से अधिक मरीज देखने को मजबूर हैं। परामर्श में महज 30 सेकंड का समय मिलने से नाराज मरीजों के परिजनों और जूनियर डॉक्टरों के बीच तीखी बहस और धक्का-मुक्की आम बात बन चुकी है।
स्वास्थ्य व्यवस्था के आंकड़ों की हकीकत
जिला अस्पतालों में बुनियादी सुविधाओं, वेंटिलेटर और विशेषज्ञ डॉक्टरों की भारी कमी के कारण 'रेफरल बोझ' अकेले MYH पर आ गिरता है।
| क्षेत्र | MYH (इंदौर) की स्थिति | मालवा-निमाड़ के जिला अस्पताल |
|---|---|---|
| रोजाना ओपीडी भार | 3,000 से 4,500 मरीज | 300 से 600 मरीज (अधिकांश रेफर) |
| डॉक्टर-मरीज अनुपात | 1 डॉक्टर पर ~150-200 मरीज/दिन | विशेषज्ञों (M.D./M.S.) के 50%-60% पद खाली |
| वेंटिलेटर उपलब्धता | मांग की तुलना में 30%-40% कम | अधिकांश जिलों में शो-पीस बने या ऑपरेटर नहीं |
| नर्सिंग व पैरामेडिकल स्टाफ | स्वीकृत पदों की तुलना में 35% कमी | 45% से 50% तक पद रिक्त |
एमवाय अस्पताल में समय पर इलाज नहीं मिलने से मौत का आरोप : एमवायएच (MYH) कैंपस स्थित सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में हाल ही में घटी घटना ढहते रेफरल सिस्टम और भारी दबाव का प्रत्यक्ष प्रमाण है। झाबुआ जिले से गंभीर स्थिति में लाई गई 42 वर्षीय महिला मरीज को प्राथमिक उपचार में हुई देरी और वेंटिलेटर बेड न मिलने के कारण अपनी जान गंवानी पड़ी।
महिला की मौत के बाद आक्रोशित परिजनों ने अस्पताल के आईसीयू और कॉरिडोर में जमकर हंगामा किया। परिजनों का सीधा आरोप था कि मरीज को घंटों स्ट्रेचर पर रखा गया और डॉक्टरों ने ‘बेड खाली नहीं हैं’ का हवाला देकर समय पर वेंटिलेटर सपोर्ट नहीं दिया। दूसरी ओर, ऑन-ड्यूटी जूनियर डॉक्टरों का कहना था कि अस्पताल के सभी वेंटिलेटर और आईसीयू बेड पहले से ही अन्य गंभीर मरीजों से फुल थे।
महिला की मौत के बाद इंदौर के सुपरस्पेशलिटी के आईसीयू में घुसे परिजन : सुपर स्पेशिएलिटी अस्पताल में एक मरीज की मौत के बाद परिजन और मेडिकल स्टाफ के बीच विवाद हो गया। करीब 30 से 35 लोग ICU में घुस आए। ICU में हंगामे के साथ तोड़फोड़ की गई। घटना अस्पताल की छठी मंजिल पर स्थित ICU में शाम करीब 7 बजे हुई। हंगामे के दौरान डॉक्टर और नर्सिंग स्टाफ को अपनी सुरक्षा के लिए वहां से बाहर निकलना पड़ा। मृतक की पहचान 60 वर्षीय ताहिरा कपाड़िया के रूप में हुई है। परिजनों के अनुसार ताहिरा को पिछले रविवार को तबीयत खराब होने के बाद एमवाय अस्पताल में भर्ती कराया गया था। परिवार का कहना है कि डॉक्टरों ने उनके दिल में ब्लॉकेज की जानकारी दी थी। इसके बाद उन्हें उपचार के लिए सुपर स्पेशिएलिटी अस्पताल लाया गया था। मोईज के मुताबिक मंगलवार को ताहिरा कपाड़िया को ऑपरेशन के लिए ले जाया गया था। परिवार का कहना है कि ऑपरेशन से पहले ताहिरा कपाड़िया सामान्य स्थिति में थीं और परिवार के लोगों से बातचीत भी कर रही थीं। ऑपरेशन थिएटर ले जाने के करीब 20 मिनट बाद एक डॉक्टर बाहर आए और इमरजेंसी की बात कही।
एमवाय अस्पताल (MYH) के अधीक्षक प्रो. (डॉ.) अशोक यादव, सुपर स्पेशलिटी अस्पताल के अधीक्षक डॉ. डी.के. शर्मा और मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) डॉ. माधव प्रसाद हसानी की ओर से आधिकारिक प्रतिक्रियाएं।
मालवा-निमाड़ के 8 से अधिक जिलों (धार, झाबुआ, खरगोन, खंडवा, बड़वानी आदि) से मरीजों का सीधे इंदौर रेफर होना, MYH और सुपर स्पेशलिटी अस्पताल पर बेकाबू बोझ, डॉक्टरों पर अत्यधिक मानसिक तनाव, संसाधनों का अभाव और आए दिन होने वाले डॉक्टर-मरीज विवादों पर MYH अधीक्षक, सुपर स्पेशलिटी अधीक्षक और इंदौर CMHO का दृष्टिकोण व बयान:
क्षेत्रीय दबाव और संसाधनों की कमी से डॉक्टरों पर मानसिक और भावनात्मक दबाव बढ़ता।
“एमवाय अस्पताल पूरे मालवा-निमाड़ का एकमात्र प्रमुख टर्शरी केयर सेंटर है। हमारे पास स्वीकृत क्षमता 1,400पलंग की है, लेकिन कई बार ओपीडी और कैजुअल्टी को मिलाकर रोजाना 3,000 से 4,000 मरीजों की देखरेख करनी पड़ती है। आसपास के जिला अस्पतालों से ऐसे मरीजों को भी अंतिम समय में रेफर कर दिया जाता है, जिन्हें बुनियादी स्तर पर रोका जा सकता था। हमारे जूनियर और रेजिडेंट डॉक्टर 18-18 घंटे लगातार काम कर रहे हैं। जब एक ही बेड पर दो मरीजों का इलाज करना पड़ता है या वेंटिलेटर वेटिंग में होते हैं, तो डॉक्टरों पर भारी मानसिक और भावनात्मक दबाव बनता है। इस बीच यदि किसी मरीज की मौत हो जाती है तो परिजन सारा गुस्सा डॉक्टरों पर निकालते हैं। हिंसा और अभद्रता से डॉक्टरों का मनोबल टूटता है, जबकि कमी संसाधनों की है, डॉक्टरों की मंशा की नहीं।”
प्रो. (डॉ.) अशोक यादव — अधीक्षक, एमवाय अस्पताल (MYH), इंदौर
रेफरल सिस्टम की नाकामी, अनियंत्रित केस लोड और डॉक्टर-मरीज के बीच बढ़ता टकराव।
“पेरिफेरल और जिला अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों (Cardiologists, Neurologists) और टेक्नीशियनों की कमी के कारण मरीज सीधे हमारे सुपर स्पेशलिटी सेंटर में भेजे जा रहे हैं। जब मरीज यहां पहुंचता है, तो उसकी स्थिति बेहद क्रिटिकल हो चुकी होती है। हमारे आईसीयू (ICU) हमेशा 100% से अधिक क्षमता पर चल रहे होते हैं। जब किसी गंभीर मरीज को बेड या वेंटिलेटर के लिए इंतजार करना पड़ता है, तो परिजनों का आक्रोश स्वाभाविक होता है, लेकिन डॉक्टरों के साथ मारपीट और आईसीयू में घुसकर तोड़फोड़ करना किसी समस्या का समाधान नहीं है। डॉक्टरों और मरीजों के बीच संवाद की कमी की मुख्य वजह समय और स्टाफ का अभाव है। जब तक निचले स्तर पर हेल्थ इन्फ्रास्ट्रक्चर मजबूत नहीं होगा, तब तक टर्शरी अस्पतालों पर यह दबाव और तनाव खत्म नहीं हो सकता।”
डॉ. डी.के. शर्मा — अधीक्षक, सुपर स्पेशलिटी अस्पताल, इंदौर
जिला व ग्रामीण स्वास्थ्य प्रणाली की स्थिति
“यह सच है कि इंदौर के सरकारी अस्पतालों पर संभाग भर का भारी रीजनल बोझ है। ग्रामीण और जिला स्तर के प्राथमिक (PHC) व सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (CHC) में बुनियादी सुविधाओं, डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ की कमी के चलते रेफरल की संख्या बढ़ी है। हमारा प्रयास है कि जिलों से बिना वजह होने वाले 'अनावश्यक रेफरल' को रोका जाए और एक 'स्टेबलाइजेशन प्रोटोकॉल' लागू किया जाए ताकि मरीज को इंदौर भेजने से पहले प्राथमिक उपचार वहीं मिले। साथ ही, जिला स्तर पर विशेषज्ञ डॉक्टरों के खाली पदों को भरने और वेंटिलेटर/ऑक्सीजन सुविधाओं को चालू रखने के लिए लगातार पत्राचार किया जा रहा है। इंदौर के अस्पतालों में डॉक्टरों की सुरक्षा और मरीजों को समय पर इलाज मिलना—दोनों हमारी प्राथमिकता हैं।”
डॉ. माधव प्रसाद हसानी — मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO), इंदौर
तीनों प्रशासनिक अधिकारियों की टिप्पणियों से स्पष्ट है कि समस्या की जड़ इंदौर का MYH या सुपर स्पेशलिटी अस्पताल नहीं, बल्कि पूरे मालवा-निमाड़ का ढह चुका रेफरल सिस्टम और प्राथमिक स्वास्थ्य ढांचे में संसाधनों की भारी कमी है। जब तक जिला अस्पतालों में वेंटिलेटर, ऑक्सीजन और विशेषज्ञ डॉक्टर उपलब्ध नहीं होंगे, तब तक इंदौर के अस्पतालों में डॉक्टरों पर मानसिक दबाव और मरीजों के परिजनों के साथ हिंसक झड़पों का सिलसिला थमता नजर नहीं आता है।
इंदौर के महाराजा यशवंतराव अस्पताल (MYH) और एमजीएम (MGM) मेडिकल कॉलेज से जुड़े पूरे परिसर की आधिकारिक और वर्तमान संसाधन क्षमता:
1. बेड और क्लिनिकल क्षमता
- मूल एमवाय अस्पताल (मुख्य 7 मंजिला भवन): 1,300 बेड स्वीकृत (जो अत्यधिक दबाव के समय 1,500+ तक खींच दिए जाते हैं)।
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संपूर्ण एमवाय समूह (MGM कैंपस के सभी अस्पताल मिलाकर): 3,000 बेड।
- सुपर स्पेशलिटी अस्पताल: 600 बेड
- एमटीएच महिला एवं प्रसूति अस्पताल: 500 बेड
- चाचा नेहरू बाल अस्पताल: 200 बेड
- कैंसर अस्पताल: 100 बेड
- एम.आर. टीबी अस्पताल: 100 बेड
- मानसिक अस्पताल (बाणगंगा): 100 बेड
2. क्रिटिकल केयर (ICU व वेंटिलेटर)
- आईसीयू बेड (मुख्य MYH): 25-30 बेड की मेडिकल आईसीयू (MICU) (इसके अलावा SICU, NICU, PICU और बर्न यूनिट्स में पृथक बेड)।
- वेंटीलेटर: पूरे कैंपस को मिलाकर लगभग 150-180 क्रियाशील वेंटिलेटर (सुपर स्पेशलिटी और एमवाय मिलाकर)।
- डायलिसिस: 15 हीमोडायलिसिस मशीनें।
3. ओपीडी और दैनिक मरीज भार
- दैनिक फुटफॉल (MYH मुख्य भवन): 3,000 से 4,500 मरीज प्रतिदिन।
- कैजुअल्टी/इमरजेंसी: 300 से 500 इमरजेंसी केस रोजाना (जिसमें 40-50% केस मालवा-निमाड़ के अन्य जिलों से रेफर होकर आते हैं)।
4. डॉक्टर और मानव संसाधन (MGM मेडिकल कॉलेज संकाय)
- डॉक्टर व फैकल्टी: 350-400 (प्रोफेसर, एसोसिएट/असिस्टेंट प्रोफेसर व कंसलटेंट)।
- रेजिडेंट व जूनियर डॉक्टर (PGs/Interns): ~600-700 (इन्हीं पर 24 घंटे नाइट ड्यूटी और इमरजेंसी सेवाओं का मुख्य भार रहता है)।
- नर्सिंग स्टाफ: स्वीकृत पदों (1,200) के मुकाबले 30% से 35% पद रिक्त हैं।
- पैरामेडिकल व क्लास-4 कर्मचारी: लगभग 40% कमी, जिसे आउटसोर्स कर्मचारियों से पूरा किया जाता है।
गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार कहां?
सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल खेत मजदूर समिति (1996) मामले में स्पष्ट किया था कि समय पर समयबद्ध चिकित्सीय उपचार न मिलना जीवन के मौलिक अधिकार का हनन है। जब एक नागरिक को इलाज के लिए फर्श पर सोने को मजबूर होना पड़े, तो यह केवल स्वास्थ्य सेवाओं की नाकामी नहीं, बल्कि एक संवैधानिक विफलता है। जब तक जिला और तहसील स्तर के अस्पतालों में डॉक्टरों की भर्ती और जरूरी उपकरण सुनिश्चित नहीं किए जाएंगे, तब तक एमवायएच की व्यवस्थाएं ऐसे ही चरमराती रहेंगी और आम नागरिक अपनी गरिमा गंवाता रहेगा।


