
नेपाल-तिब्बत सीमा पर ग्लेशियर टूटने से आई विनाशकारी बाढ़ ने हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों और उनसे बनी झीलों के खतरे की घंटी फिर बजा दी है। 26 अगस्त की घटना में बर्फ, चट्टान और मलबे के साथ अचानक आई बाढ़ ने बड़े पैमाने पर तबाही मचाई। इसका सीधा सबक कश्मीर हिमालय के लिए भी महत्वपूर्ण है, जहां बढ़ते तापमान और ग्लेशियरों के पीछे हटने से ग्लेशियल झीलों की संख्या और आकार दोनों बढ़ रहे हैं। ALSO READ: नेपाल की बाढ़ में फंसे 320 भारतीयों से संपर्क नहीं, खरगे ने PM मोदी और अमित शाह से की बड़ी मांग
कश्मीर पर जनवरी 2026 में प्रकाशित एक विस्तृत अध्ययन के अनुसार 1992 से 2024 के बीच क्षेत्र में 155 ग्लेशियल झीलों का वैज्ञानिक आकलन किया गया। खास चिंता की बात यह है कि बर्फ से सीधे जुड़ी प्रोग्लेशियल झीलों के क्षेत्रफल में 32 वर्षों में 26 प्रतिशत वृद्धि दर्ज हुई है।
इससे पहले ऊपरी झेलम बेसिन के एक अध्ययन में 393 ग्लेशियल झीलें चिन्हित की गई थीं, जिनमें 102 प्रोग्लेशियल, 13 सुप्राग्लेशियल और 278 अन्य ग्लेशियल झीलें शामिल थीं। इनमें 21 झीलों को संभावित रूप से खतरनाक पाया गया—सात उच्च, नौ मध्यम और पांच निम्न खतरे की श्रेणी में। इन संभावित खतरनाक झीलों का क्षेत्रफल 1980 के 5.92 वर्ग किलोमीटर से बढ़कर 2020 में 8.46 वर्ग किलोमीटर, यानी करीब 30 प्रतिशत बढ़ गया।
एक अन्य दीर्घकालिक अध्ययन में कश्मीर हिमालय की ग्लेशियल झीलों की संख्या 1990 के 253 से बढ़कर 2018 में 324 हो गई, जबकि उनका कुल क्षेत्रफल 18.84 से बढ़कर 22.13 वर्ग किलोमीटर हो गया। अध्ययन के अनुसार 0.1 वर्ग किलोमीटर से बड़ी झीलें अचानक फटने पर नीचे के इलाकों में विनाशकारी बाढ़ पैदा करने की क्षमता रखती हैं। खतरा केवल झील के फटने तक सीमित नहीं है। ग्लेशियर का टूटना, हिमस्खलन, चट्टानों का झील में गिरना अथवा भूकंपीय हलचल झील की प्राकृतिक बांध जैसी संरचना को तोड़ सकती है। इसके बाद पानी, बर्फ और मलबे की तेज धारा घाटियों में कई किलोमीटर तक तबाही मचा सकती है।
नेपाल की घटना ने इस जोखिम को और गंभीर बना दिया है। विशेषज्ञों के मुताबिक गर्म होते हिमालय में ग्लेशियरों का पीछे हटना, पर्माफ्रॉस्ट का कमजोर होना और अस्थिर पर्वतीय ढलान आपस में मिलकर ऐसी घटनाओं की संभावना बढ़ा रहे हैं। ALSO READ: नेपाल-तिब्बत सीमा पर मंडराया बड़ा खतरा, 72 घंटे में टूट सकती है बैरियर लेक, फिर आ सकती है प्रलयंकारी बाढ़
कश्मीर के लिए चुनौती अब केवल ग्लेशियरों की निगरानी नहीं, बल्कि संभावित खतरनाक झीलों की 24 घंटे निगरानी, शुरुआती चेतावनी प्रणाली और निचली घाटियों में त्वरित निकासी योजना तैयार करना है। नेपाल की त्रासदी ने स्पष्ट कर दिया है कि हिमालय में छोटी-सी झील भी अचानक बड़े जलप्रलय में बदल सकती है।


