तिब्बत में टूटा ग्लेशियर का ‘थूथन’, नेपाल में हाहाकार, 30 फीट ऊंची प्रलयंकारी बाढ़ का खौफनाक सच

तिब्बत में टूटा ग्लेशियर का 'थूथन', नेपाल में हाहाकार, 30 फीट ऊंची  प्रलयंकारी बाढ़ का खौफनाक सच

Tibet Glacier Collapse

Tibet Glacier Collapse: हाल ही में नेपाल-तिब्बत सीमा पर आई प्रलयंकारी बाढ़ ने एक बार फिर हिमालयी क्षेत्रों में मंडराते गंभीर पर्यावरणीय और भू-वैज्ञानिक खतरों को उजागर किया है। प्लैनेट लैब्स (Planet Labs) की उपग्रह छवियों और वैश्विक भू-विज्ञानियों (Geologists) के विश्लेषण के अनुसार, इस तबाही का मुख्य कारण ग्लेशियर के निचले हिस्से (Glacier Snout) का ढहना, तीव्र बर्फ का पिघलना और संभावित भूकंपीय हलचल का एक खतरनाक परिणाम है। हालांकि यह भी कहा जा रहा है कि यह भूकंप नहीं बल्कि ग्लेशियर के ढहने से पैदा हुआ कंपन था, जिसकी तीव्रता 5.2 थी। हिमस्खलन ने ही भूकंप जैसा कंपन पैदा किया था।

नेपाल-तिब्बत सीमा पर आई हालिया तबाही ने पूरे दक्षिण एशिया में पर्यावरण और भू-वैज्ञानिक सुरक्षा पर गहरा संकट पैदा कर दिया है। वैज्ञानिक रिपोर्ट बताती है कि कैसे 5,200 मीटर की ऊंचाई पर घटी एक घटना ने महज 30 मिनट के भीतर नदियों का जलस्तर 30 फीट (9 मीटर) तक बढ़ा दिया। ALSO READ: नेपाल त्रासदी में मानवता का 'घिनौना चेहरा', मदद की बजाए मची लूटपाट, सिलेंडर लेकर भागे लोग

घटना का मुख्य वैज्ञानिक कारण : 'बर्फ-चट्टान हिमस्खलन' (Ice-Rock Avalanche)

सिक्किम यूनिवर्सिटी के भू-विज्ञान विशेषज्ञ डॉ. विक्रम गुप्ता और कैलगरी विश्वविद्यालय के पृथ्वी विज्ञानी डैन शूगर के उपग्रह इमेजरी विश्लेषण के अनुसार:

  • ग्लेशियर स्नाउट का ढहना: लगभग 5,200 मीटर की ऊंचाई पर स्थित ग्लेशियर का अग्रभाग (Snout) टूटकर लगभग 1,200 मीटर नीचे घाटी के फर्श (Valley Floor) पर गिर गया।
  • विशाल मलबे का वेग: इस हिमस्खलन में केवल बर्फ ही नहीं, बल्कि सैकड़ों टन भारी चट्टानें, गाद और तलछट (Sediment) शामिल थे। इतने विशाल द्रव्यमान के 1.2 किलोमीटर की ऊंचाई से गिरने से उत्पन्न गतिज ऊर्जा (Kinetic Energy) ने घाटी के जल स्रोतों में एक अप्रत्याशित शॉकवेव पैदा की।

24 घंटे में तापमान वृद्धि और त्वरित पिघलाव (Thermal Forcing)

डैन शूगर के अनुसार, आपदा से 24 घंटे पहले की प्लैनेट लैब्स की तस्वीरों की तुलना करने पर यह स्पष्ट हुआ कि घाटी के जो ग्लेशियर कल तक बर्फ से ढके (Snow-covered) थे, वे अचानक 'बेयर आइस' (Bare Ice) यानी बिना बर्फ की नग्न परतों में बदल गए। ALSO READ: Nepal Flash Flood : बाढ़ ने नेपाल में मचाई तबाही, खौफनाक Photos देख खड़े हो जाएंगे रोंगटे

  • अत्यधिक थर्मल मेल्टिंग : यह दर्शाता है कि क्षेत्र में अचानक तापमान में असामान्य वृद्धि हुई, जिसने ग्लेशियर के ऊपरी हिस्से को तेजी से पिघलाया।
  • सब-ग्लेशियर वॉटर प्रेशर : पिघला हुआ पानी ग्लेशियर के निचले हिस्सों में रिसकर जमा हो गया, जिसने बर्फ और चट्टानों के बीच के घर्षण (Friction) को कम कर दिया और स्नाउट के अचानक टूटने का कारण बना।

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भूकंपीय कंपन ने पहले से ही असंतुलित और अत्यधिक पिघलाव का सामना कर रहे ग्लेशियर की संरचनात्मक स्थिरता (Structural Integrity) को तुरंत नष्ट कर दिया।

Tibet Glacier Collapse

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क्या 'हिंदू कुश हिमालय' में विनाश का अलार्म बज चुका है?

संयुक्त राष्ट्र (UN) और ICIMOD (इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट) की रिपोर्ट के अनुसार, नेपाल ने पिछले 30 वर्षों में अपनी एक-तिहाई बर्फ खो दी है। पिछले दशक में यहाँ ग्लेशियर 65% तेजी से पिघले हैं

यह घटना स्पष्ट संकेत देती है कि ग्लोबल वार्मिंग, अनियंत्रित निर्माण और जलवायु परिवर्तन के कारण अब हिमालयी क्षेत्रों में GLOF (Glacial Lake Outburst Flood), बर्फ-चट्टान हिमस्खलन और अचानक आने वाली प्रलयंकारी बाढ़ का खतरा खतरनाक स्तर पर पहुँच गया है।