
उत्तरप्रदेश के 558 अनुदानित मदरसों में शासन से मिले 1,100 करोड़ रुपए के वार्षिक बजट के नियम विरुद्ध दुरुपयोग और बड़े पैमाने पर धांधली का मामला अब गर्मा गया है। इस पूरे प्रकरण की विस्तृत जांच अब भ्रष्टाचार निवारण संगठन (एंटी करप्शन ब्यूरो) को सौंप दी गई है। एडीजी एंटी करप्शन के निर्देश पर महानिरीक्षक मोहित गुप्ता ने उपमहानिरीक्षक (DIG) हरिश्चंद्र को जांच अधिकारी नियुक्त किया है।
हाईकोर्ट के आदेश के बाद एंटी करप्शन को मिली कमान
बाराबंकी निवासी मोहम्मद तलहा अंसारी की 333 पन्नों की शिकायत पर केंद्रीय मानवाधिकार आयोग के आदेश से यह जांच पहले आर्थिक अपराध शाखा (EOW) को सौंपी गई थी। हालांकि, टीचर्स एसोसिएशन मदारीश अरबीया उत्तर प्रदेश और एक मदरसा प्रबंध समिति द्वारा हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करने के बाद, अदालत ने आयोग के अधिकार क्षेत्र पर सवाल उठाते हुए EOW जांच पर रोक लगा दी। इसके बाद शासन ने यह जांच एंटी करप्शन ब्यूरो को हस्तांतरित कर दी।
35 गंभीर बिंदुओं पर होगी सूक्ष्म जांच:
फर्जी नियुक्तियां व दस्तावेज: कोविड काल के दौरान नियमों को ताक पर रखकर की गई शिक्षकों व कर्मचारियों की नियुक्तियों, योग्यताओं और छात्र संख्या की सत्यता पर सवाल उठे हैं।
वित्तीय हेरफेर: संदिग्ध प्रबंध समितियों के जरिए वेतन भुगतान, सरकारी अनुदान का दुरुपयोग और फर्जी हस्ताक्षरों से लेकर सोसायटी रिकॉर्ड में कथित हेरफेर की फॉरेंसिक जांच की मांग की गई है।
चंदा व जकात में धांधली: सरकारी सहायता के अलावा जकात, सदका, फितरा और निजी चंदे से जुटाई गई राशि में भी वित्तीय अनियमितताओं के आरोप हैं।
संगठित नेटवर्क की आशंका : शिकायतकर्ता ने विभिन्न जिलों के उदाहरण देते हुए अनियमितताओं के तौर-तरीकों में एक जैसी समानता का दावा किया है, जिससे किसी बड़े संगठित सिंडिकेट का संदेह गहरा गया है।
फाइलों को दबाने की पड़ताल : आरोप है कि पूर्व में हुई विभागीय जांचों की रिपोर्ट को दबा दिया गया था, जिसकी भी अब नए सिरे से समीक्षा होगी।
अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के निदेशक शीलधर यादव ने बताया कि आधिकारिक आदेश मिलते ही जांच एजेंसी को पूरा सहयोग और संबंधित दस्तावेज उपलब्ध कराए जाएंगे। एंटी करप्शन ब्यूरो द्वारा शिकायतकर्ता से अभिलेख मांगे जाने के बाद अब मदरसा प्रबंधकों और संबंधित अधिकारियों की धड़कनें तेज हो गई हैं।


