
संसद के मानसून सत्र में मोदी सरकार पर बेहद अक्रामक रहने वाली कांग्रेस अब आदिवासी और दलित वोट बैंक को साधने के लिए एक नया नैरेटिव बनाते हुए दिखाई दे रही है। दरअसल पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे से जुड़े हल्द्वानी के शुद्धिकरण विवाद से मध्यप्रदेश के छतरपुर के केन-बेतवा परियोजना से जुड़े आंदोलन तक,दलित और आदिवासी समुदायों के बीच अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत कर कांग्रेस सामाजिक न्याय के नया सियासी नैरेटिव को धार देने की कोशिश में दिखाई दे रही है।
उत्तराखंड के हल्द्वानी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की रैली के बाद रामलीला मैदान में हुए शुद्धिकरण अनुष्ठान को पार्टी ने दलित सम्मान और जातिगत भेदभाव से जोड़ा है। वहीं राहुल गांधी के मध्यप्रदेश के छतरपुर में केन-बेतवा लिंक परियोजना के प्रभावित परिवारों, खासकर आदिवासियों के पुनर्वास और मुआवजे के सवाल को कांग्रेस जल-जंगल-जमीन और आदिवासी अधिकारों के मुद्दे के तौर पर उठा रही है।
हल्द्वानी में शुद्धिकरण से दलित सम्मान का सवाल-उत्तराखंड के हल्द्वानी के 8 अगस्त को रामलीला मैदान में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की सभा के बाद वहां शुद्धिकरण अनुष्ठान किए जाने की खबर सामने आई। कांग्रेस ने इसे महज धार्मिक या सांस्कृतिक गतिविधि मानने के बजाय दलित अस्मिता से जोड़ दिया। खड़गे ने राज्यसभा में इस घटना का जिक्र करते हुए कहा कि वे अनुसूचित जाति से आते हैं और इस घटना से उन्हें छुआछूत का दर्द महसूस हुआ।
राज्यसभा में पूरे मामले को उठाते हुए मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि हल्द्वानी में मेरे भाषण के बाद, बीजेपी के लोगों ने उस मंच को शुद्ध करने के लिए वहां हवन किया, क्या लोकतंत्र में ऐसा होता है? उन्होंने आगे कहा कि मैं इसे राजनीतिक मुद्दा नहीं बनाना चाहता। मैं बरसों से इस सदन का सदस्य रहा हूं। मैं अनुसूचित जाति से आता हूं और दलित हूं, मैंने कभी किसी से यह गुहार नहीं लगाई कि मेरी मदद करो या मेरी रक्षा करो।
कांग्रेस ने हल्द्वानी की पूरी घटना को दलित नेता के सम्मान बनाम जातिगत भेदभाव की मानसिकता के तौर पर पेश कर रही है। पार्टी नेताओं ने इसे लोकतांत्रिक मूल्यों और सामाजिक बराबरी के खिलाफ बताया है। कांग्रेस इस विवाद को व्यापक सामाजिक न्याय के मुद्दे में बदलने की कोशिश कर रही है। संदेश यह है कि खड़गे का अपमान केवल एक नेता का नहीं, बल्कि दलित समाज के सम्मान का सवाल है।
केन-बेतवा के सहारे आदिवासी वोटर्स को साधने की कोशिश-दलितों को साधने के साथ लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी ने गुरुवार को केन-बेतवा लिंक परियोजना के पीड़ित परिवारों से मिलकर आदिवासी वोट बैंक को साधने की कोशिश की। दरअसल मध्यप्रदेश के छतरपुर में केन-बेतवा लिंक परियोजना के कारण विस्थापन, मुआवजे और पुनर्वास को लेकर प्रभावित परिवारों का आंदोलन पिछले कई महीनों से जारी है। जुलाई में आदिवासी परिवारों ने जल सत्याग्रह, चिता आंदोलन और फांसी सत्याग्रह जैसे बड़े विरोध प्रदर्शन किए। मध्यप्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार प्रभावित लोगों के बीच पहुंच चुके हैं। उन्होंने इसे किसान, दलित और आदिवासी परिवारों के न्याय से जोड़ते हुए आंदोलन को समर्थन दिया है।
दलित-आदिवासी मुद्दों को जोड़ने की कोशिश-संसद के मानसून सत्र के आखिरी दिन कांग्रेस हल्द्वानी और छतरपुर के जरिए दलित और आदिवासी वोट बैंक को साधने की कोशिश करती दिखाई दी। हल्द्वानी में सवाल सामाजिक सम्मान और जातिगत भेदभाव का है, जबकि छतरपुर में जमीन, विस्थापन और पुनर्वास का। एक तरफ कांग्रेस कह रही है कि दलित समाज के नेता के साथ कथित तौर पर भेदभाव हुआ, दूसरी तरफ वह आदिवासी परिवारों के लिए कह रही है कि विकास के नाम पर उनकी जमीन और आजीविका की अनदेखी नहीं की जा सकती।
कांग्रेस अपने पुराने सामाजिक न्याय के एजेंडे को नए राजनीतिक संदर्भ में दोबारा स्थापित करने की कोशिश कर सकती है। सियासी तौर पर देखें तो दलित और आदिवासी दोनों ही कांग्रेस के लिए कभी पारंपरिक वोट बैंक के तौर पर देखा जाता था लेकिन 2014 के बाद कांग्रेस के इस बड़े कोर वोट बैंक में सेंध लगी। उत्तर प्रदेश में जहां दलित वोट बैंक और मध्यप्रदेश में आदिवासी वोट बैंक किंगमेंकर के तौर पर माना जाता है। ऐसे में हल्द्वानी के दलित सम्मान और छतरपुर के आदिवासी अधिकार के मुद्दों को कांग्रेस के द्वारा लगातार उठाना उसकी चुनावी राजनीति में सामाजिन न्याय के नैरिटव को साधना है। कांग्रेस एक सीधा संदेश देने की कोशिश मे है कि दलित समुदाय का सामाजिक रूप से अपमान, आर्थिक असुरक्षा या विस्थापन का सामना कर रहे आदिवासियों के साथ पार्टी मजबूती के साथ खड़ी है।
कांग्रेस का यह संदेश दलित और आदिवासी मतदाताओं के बीच पार्टी की स्वीकार्यता बढ़ाने की कोशिश का आधार बन सकता है। खासकर मध्य प्रदेश में, जहां आदिवासी क्षेत्रों में जमीन, वनाधिकार, विस्थापन और रोजगार जैसे मुद्दे लंबे समय से राजनीतिक विमर्श का हिस्सा रहे हैं।
हल्द्वानी का शुद्धिकरण विवाद और छतरपुर का केन-बेतवा आंदोलन से आदिवासी अधिकारों को साथ रखकर कांग्रेस अपने लिए एक ऐसा राजनीतिक नैरेटिव तैयार कर रही है, जिसमें सम्मान, संविधान, जमीन, पुनर्वास और सामाजिक न्याय एक ही धागे में जुड़े दिखाई देते हैं। यह रणनीति कांग्रेस के लिए सिर्फ विपक्षी सरकारों पर हमला करने का माध्यम नहीं, बल्कि दलित और आदिवासी मतदाताओं के बीच यह संदेश मजबूत करने की कोशिश भी है कि ‘आपके सम्मान और अधिकार की लड़ाई में कांग्रेस आपके साथ है।


