
Balochistan conflict: पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत बलूचिस्तान आज हिंसा, विद्रोह और धमाकों की आग में झुलस रहा है। बलोच लिबरेशन आर्मी (BLA) और अन्य लड़ाका गुट आए दिन पाकिस्तानी सेना और चीनी नागरिकों को निशाना बना रहे हैं। लेकिन सवाल यह उठता है कि जिस बलूचिस्तान को पाकिस्तान अपना हिस्सा बताता है, वहां के लोग इस्लामाबाद के खिलाफ इतने आक्रामक क्यों हैं? इसका जवाब छुपा है बलोचों के स्वाभिमानी इतिहास और दशकों से हो रहे उनके शोषण में।
बलोच लड़ाकों का निडर इतिहास: कभी किसी के आगे नहीं झुके
बलूचिस्तान का इतिहास शूरवीरता और अपनी स्वायत्तता की रक्षा करने की कहानियों से भरा हुआ है। इतिहासकार बताते हैं कि बलोच जनजाति के लोग मूल रूप से सीरिया और ईरान के पहाड़ी इलाकों से आकर यहाँ बसे थे।
- अंग्रेजों से लोहा: 19वीं सदी में जब ब्रिटिश साम्राज्य पूरे भारतीय उपमहाद्वीप पर कब्जा कर रहा था, तब भी बलूचिस्तान की 'कलात रियासत' (State of Kalat) ने अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखी। अंग्रेजों को भी बलोचों की छापामार युद्ध शैली (Guerilla Warfare) के आगे समझौते करने पड़े थे।
- लड़ाकू स्वभाव: बलोच समाज कबीलाई व्यवस्था पर चलता है। इनके लिए “गैरात” (आत्मसम्मान) और “जमीन” से बढ़कर कुछ नहीं है। यही वजह है कि साम्राज्य बदले, हुकूमतें बदलीं, लेकिन बलोच लड़ाकों का विद्रोही मिजाज कभी खत्म नहीं हुआ।
धोखे से पाकिस्तान में विलय : विवाद की असली जड़
15 अगस्त 1947 को अंग्रेजों के जाने के बाद कलात के खान (बलोच शासक) मीर अहमद यार खान ने बलूचिस्तान को एक स्वतंत्र देश घोषित कर दिया था। लगभग 7 महीने तक बलूचिस्तान एक आजाद मुल्क रहा।
मार्च 1948 में मोहम्मद अली जिन्ना के दबाव और सैन्य बल के प्रयोग के कारण कलात के खान को पाकिस्तान के साथ विलय पत्र पर हस्ताक्षर करने पड़े। बलोच जनता ने इस विलय को कभी दिल से स्वीकार नहीं किया और उसी दिन से पाकिस्तान के खिलाफ पहला सशस्त्र विद्रोह शुरू हो गया। ALSO READ: बलूचिस्तान में आजादी का जश्न, पाकिस्तानी प्रतीकों को हटाने का ऐलान, पाकिस्तानी सेना का कड़ा पहरा


बलूचिस्तान आंदोलन में महिलाओं की बढ़ती भूमिका: नया और निर्णायक मोड़
बलूचिस्तान के आंदोलन में सबसे बड़ा और हैरान कर देने वाला बदलाव महिलाओं की सक्रिय भागीदारी है। पारंपरिक रूप से पुरुष प्रधान माने जाने वाले बलोच समाज में आज महिलाएं केवल आंदोलन का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि वे इसका नेतृत्व कर रही हैं।
1. शांतिपूर्ण और राजनीतिक विरोध का नेतृत्व
पाकिस्तानी सेना द्वारा पुरुषों को गायब किए जाने के बाद बलोच महिलाओं ने मोर्चा संभाला।
- डॉ. महरंग बलोच और बलोच यकजेहती कमेटी (BYC): आज बलूचिस्तान में नागरिक अधिकारों की सबसे बड़ी आवाज डॉ. महरंग बलोच हैं। उनके नेतृत्व में हजारों महिलाओं ने इस्लामाबाद तक सैकड़ों किलोमीटर का लंबा मार्च निकाला और पाकिस्तानी हुकूमत की नींव हिला दी।
- करीमा बलोच का योगदान: बलोच स्टूडेंट ऑर्गनाइजेशन (BSO-अज़ाद) की पूर्व अध्यक्ष करीमा बलोच ने पहली बार छात्र आंदोलन का नेतृत्व किया था। कनाडा में उनकी रहस्यमयी मौत के बाद बलोच महिलाओं में आक्रोश और बढ़ गया। ALSO READ: बलूचिस्तान में आजादी के जश्न से नाराज पाकिस्तान ने आधी रात को कर दी एयरस्ट्राइक, 9 बच्चों और 7 महिलाओं समेत 28 लोगों की मौत: Balochistan Independence Day
2. सशस्त्र संघर्ष और BLA की 'माजिद ब्रिगेड'
आंदोलन का दूसरा पहलू और भी अधिक रणनीतिक और आक्रामक है। बलोच लिबरेशन आर्मी (BLA) ने अपनी सुसाइड बॉम्बर विंग 'माजिद ब्रिगेड' में महिलाओं को शामिल किया है:
- शारी बलोच (2022): कराची यूनिवर्सिटी में चीनी नागरिकों पर आत्मघाती हमला करने वाली शारी बलोच एक पढ़ी-लिखी शिक्षिका और दो बच्चों की मां थी। इस घटना ने दुनिया भर को स्तब्ध कर दिया।
- सुम्बुल बलोच और महल बलोच: हाल के वर्षों में कई पढ़ी-लिखी बलोच महिलाओं ने आत्मघाती हमलों को अंजाम दिया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि दमन के खिलाफ युवा महिलाएं किस सीमा तक जाने को तैयार हैं।
3. सामाजिक चेतना और बदलाव
अब बलोच महिलाएं केवल घरों में पीड़ित बनकर बैठने के बजाय अदालतों, प्रेस क्लबों और सड़कों पर अपने पतियों, भाइयों और बेटों की रिहाई के लिए आवाज उठा रही हैं। महिला शिक्षा और राजनीतिक चेतना ने इस आंदोलन को केवल एक कबीलाई विद्रोह न बनाकर एक राष्ट्रीय चेतना आंदोलन में बदल दिया है।
क्या है बलूचिस्तान का भविष्य?
पाकिस्तानी सेना ने दशकों तक सैन्य अभियानों के जरिए बलूचिस्तान की आवाज दबाने की कोशिश की है, लेकिन हर सैन्य कार्रवाई के साथ बलोचों का गुस्सा और बढ़ जाता है। चीन के अरबों डॉलर के निवेश (CPEC) पर मंडराते खतरे और बलोच विद्रोहियों के बढ़ते मनोबल ने इस्लामाबाद की नींद उड़ा दी है।
बलूचिस्तान की यह आग केवल पाकिस्तान के नक्शे तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे दक्षिण एशिया की भू-राजनीति को बदलने का माद्दा रखती है। अब जब बलूचिस्तान की पढ़ी-लिखी युवा पीढ़ी और महिलाएं सड़क से लेकर सशस्त्र संघर्ष तक में आगे आ चुकी हैं, तब इस्लामाबाद के लिए इस आंदोलन को दबाना आसान नहीं रह गया है। चीन के अरबों डॉलर के निवेश (CPEC) पर मंडराते खतरे और बलोच विद्रोहियों की बढ़ती ताकत ने पाकिस्तान की रणनीतिक चिंताएं बढ़ा दी हैं।


