जनता की कमाई के 175 करोड़ स्वाहा, माननीयों के हंगामे में संसद के 173 घंटे बर्बाद

जनता की कमाई के 175 करोड़ स्वाहा, माननीयों के हंगामे में संसद के 173 घंटे बर्बाद

Parliament Monsoon Session 2026

Parliament Monsoon Session 2026: संसद का मानसून सत्र 2026 आखिरकार अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हो गया। जनता ने अपने प्रतिनिधि चुनकर इसलिए दिल्ली भेजे थे ताकि देश की तकदीर और उनके मुद्दों पर बात हो सके, लेकिन माननीय नेताओं ने संसद को केवल आरोप-प्रत्यारोप और नारेबाजी का अखाड़ा बनाकर रख दिया। आंकड़े गवाह हैं कि किस तरह जनसेवा का दावा करने वाले जनप्रतिनिधियों ने देश के आम टैक्सपेयर्स के 175 करोड़ रुपए बहस की बजाय हंगामे की भेंट चढ़ा दिए।

हंगामे में 173 घंटे बर्बाद, काम के नाम पर शून्य

पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के आंकड़ों के मुताबिक, इस सत्र में दोनों सदनों में करीब 114-114 घंटे का काम प्रस्तावित था, लेकिन हंगामे और लगातार स्थगन के चलते लोकसभा की कार्यक्षमता (Productivity) घटकर महज 19% और राज्यसभा की 39.17% पर सिमट कर रह गई। कुल मिलाकर 173 घंटे 10 मिनट का समय शोर-शराबे में धो दिया गया। संसद के हर एक मिनट की कार्यवाही पर लाखों रुपए खर्च होते हैं, लेकिन नेताओं की इस 'तू-तू, मैं-मैं' के कारण आम आदमी के पसीने की कमाई के 175 करोड़ रुपए ऐसे ही बर्बाद हो गए।  ALSO READ: राम मंदिर चढ़ावा विवाद पर संसद में अनोखा प्रदर्शन, दान पात्र में मिले 2.15 लाख रुपए हनुमान मंदिर में चढ़ाए

4 मिनट में पास हुए बिल, क्या यही है लोकतंत्र?

जब बिलों पर चर्चा की बारी आई, तो संसद के दोनों सदनों में अद्भुत 'तेज़ी' देखने को मिली। जनहित से जुड़े कई महत्वपूर्ण विधेयकों को बिना किसी सार्थक बहस के चंद मिनटों में पास कर दिया गया:

  • सुप्रीम कोर्ट जज बिल : लोकसभा में मात्र 4 मिनट की चर्चा!
  • टैक्सेशन बिल : लोकसभा में महज 3 मिनट!
  • MSME बिल : लोकसभा में केवल 3 मिनट!
  • जन्म-मृत्यु रजिस्ट्रेशन बिल : लोकसभा में सिर्फ 4 मिनट!

जिन कानूनों से देश की 140 करोड़ जनता का भविष्य तय होना है, उन्हें माननीय सांसदों ने 3 से 4 मिनट में निपटा दिया। क्या जनता इन्हें इसी 'कामकाज' के लिए भारी-भरकम वेतन, सुविधाएं और पेंशन देती है? ALSO READ: FCRA संशोधन विधेयक 2026 संयुक्त संसदीय समिति को भेजा गया, विपक्ष ने किया विरोध, अल्पसंख्यकों और NGOs को निशाना बनाने का लगाया आरोप

जनता के मुद्दों की बलि

मानसून सत्र के दौरान चंदा चोरी, जंतर-मंतर पर छात्रों पर लाठीचार्ज और एफसीआरए जैसे अहम मुद्दे थे, जिन पर गंभीर विमर्श होना चाहिए था। लेकिन राज्यसभा में 380 शून्यकाल प्रस्तावों में से केवल 52 और 285 सवालों में से महज 16 सवाल ही उठाए जा सके। सदन के अंतिम दिन भी कोई बदलाव नहीं दिखा। लोकसभा वंदे मातरम के साथ अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हो गई, तो राज्यसभा में हल्द्वानी के एक कार्यक्रम के मंच के 'शुद्धिकरण' जैसे राजनीतिक बयानों पर समय बिताया गया।

बड़ा सवाल, कौन करेगा इस नुकसान की भरपाई?

एक तरफ आम नागरिक पेट्रोल-डीजल से लेकर राशन तक पर टैक्स चुका रहा है, वहीं दूसरी तरफ देश की सर्वोच्च पंचायत में बैठे नेता संसद को काम करने के बजाय राजनीतिक थ्रिलर ड्रामा का केंद्र बनाए हुए हैं। जब तक सांसदों की इस जवाबदेही पर कड़े नियम नहीं बनते, तब तक लोकतंत्र के इस सबसे बड़े मंदिर में जनता का पैसा और समय इसी तरह स्वाहा होता रहेगा।