
Mecca Joint Defence Agreement: पश्चिम एशिया के बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य के बीच तुर्की, पाकिस्तान और सऊदी अरब ने एक ऐतिहासिक और रणनीतिक 'मक्का संयुक्त रक्षा समझौते' (Mecca Joint Defence Agreement) पर हस्ताक्षर किए हैं। सऊदी अरब के मक्का में आयोजित शिखर सम्मेलन के दौरान सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोगन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने इस त्रिपक्षीय समझौते को अंतिम रूप दिया।
इस समझौते का सबसे मुख्य बिंदु यह है कि इसमें 'किसी भी एक देश पर सशस्त्र हमले को तीनों देशों पर हमला माना जाएगा' का प्रावधान शामिल है। नाटो (NATO) के 'अनुच्छेद 5' की तर्ज पर बने इस सामूहिक सुरक्षा ढांचे को क्षेत्र का नया 'इस्लामिक नाटो' कहा जाने लगा है। यह समझौता निश्चित ही भारत के लिए चिंता का विषय है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि ऑपरेशन सिंदूर के समय तुर्की ने पाकिस्तान को Bayraktar TB2, YIHA (कामिकाज़े/आत्मघाती ड्रोन) और Asisguard Songar जैसे सैकड़ों आधुनिक सैन्य ड्रोन मुहैया कराए थे। ALSO READ: तुर्की, पाकिस्तान और सऊदी अरब ने किया त्रिपक्षीय सैन्य समझौता
इतना ही नहीं, मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, तुर्की ने पाकिस्तान को केवल ड्रोन ही नहीं दिए, बल्कि पाकिस्तान को ड्रोन हमले प्लान करने और उनका संचालन करने के लिए अपने सैन्य विशेषज्ञ और सलाहकार भी भेजे थे। उस समय पाकिस्तान ने लाहौर और अन्य ठिकानों से तुर्की निर्मित ड्रोनों का इस्तेमाल कर भारतीय सैन्य बुनियादी ढांचे (जैसे पंजाब और जम्मू-कश्मीर के क्षेत्रों) को निशाना बनाने की कोशिश की थी। उस समय दोनों देशों के बीच कोई समझौता भी नहीं था, लेकिन सैन्य समझौते के अस्तित्व में आने के बाद तुर्की भारत-पाकिस्तान तनाव की स्थिति में पाक को अन्य सैन्य सहायता भी उपलब्ध करवा सकता है।
समझौते की मुख्य बातें
- एक-दूसरे की सुरक्षा : तीनों देश सैन्य खुफिया जानकारी साझा करने, संयुक्त सैन्य अभ्यास, रक्षा तकनीक के हस्तांतरण और संकट की स्थिति में एक-दूसरे की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध हुए हैं।
- तीन शक्तियों का संगम : यह समझौता सऊदी अरब की वित्तीय ताकत, तुर्की की उन्नत सैन्य तकनीक व ड्रोन क्षमता और पाकिस्तान की विशाल सेना व परमाणु क्षमता को एक मंच पर लाता है।
- सऊदी का रुख : सऊदी प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि यह कोई गुटबाजी या सैन्य धुरी बनाने का प्रयास नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र में सुरक्षा की बदलती चुनौतियों से निपटने के लिए रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने की एक पहल है।
भारत पर क्या होगा असर?
तुर्की, पाकिस्तान और सऊदी अरब का यह नया सैन्य समीकरण भारत के लिए रणनीतिक और कूटनीतिक दोनों मोर्चों पर काफी मायने रखता है। भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) ने कहा है कि भारत इस घटनाक्रम पर बारीकी से नज़र बनाए हुए है।
खाड़ी क्षेत्र में पाकिस्तान के बढ़ते प्रभाव से चिंता
पाकिस्तान बीते कुछ समय से सऊदी अरब और खाड़ी देशों की सुरक्षा संरचना में अपनी पैठ बढ़ा रहा है। इस समझौते के जरिए पाकिस्तान को मध्य पूर्व में कूटनीतिक बढ़त (Strategic Leverage) मिल सकती है। भारत के लिए चिंता का विषय यह है कि पाकिस्तान इस प्रभाव का इस्तेमाल भविष्य में कश्मीर या अन्य द्विपक्षीय मुद्दों पर बहुपक्षीय मंचों पर माहौल बनाने के लिए न करे।
तुर्की-पाकिस्तान सैन्य गठजोड़ और तकनीक का हस्तांतरण
तुर्की लंबे समय से पाकिस्तान का रक्षा सहयोगी रहा है और वैश्विक मंचों (जैसे UN) पर पाकिस्तान के रुख का समर्थन करता आया है। इस समझौते के बाद तुर्की के आधुनिक हथियार, बायराक्तर ड्रोन और मिसाइल तकनीक पाकिस्तान को और अधिक सुलभ हो सकती है, जिसका सीधा असर दक्षिण एशियाई सैन्य संतुलन पर पड़ सकता है।
सऊदी अरब के साथ भारत के मजबूत रणनीतिक संबंध
हालांकि, भारत और सऊदी अरब के संबंध पिछले एक दशक में बेहद मजबूत हुए हैं। ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार, निवेश और आतंकवाद-विरोधी सहयोग के मामले में रियाद और नई दिल्ली बेहद करीबी साझेदार हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि सऊदी अरब भारत के साथ अपने आर्थिक व व्यापारिक संबंधों को जोखिम में नहीं डालेगा। सऊदी अरब का यह समझौता मुख्यतः लाल सागर, यमन के हूती विद्रोहियों और ईरान के साथ जारी क्षेत्रीय तनावों से अपनी सीमाओं की सुरक्षा के लिए है, न कि भारत के खिलाफ।
ऊर्जा सुरक्षा और 90 लाख भारतीय प्रवासियों का हित
पश्चिम एशिया में किसी भी तरह का नया सैन्य जमावड़ा या गुटबाजी सीधे तौर पर भारत की ऊर्जा आपूर्ति (कच्चा तेल और एलपीजी) और लाल सागर/फारस की खाड़ी के समुद्री व्यापार मार्गों को प्रभावित कर सकती है। इसके अलावा, खाड़ी देशों में लगभग 90 लाख भारतीय प्रवासी रहते हैं, जिनकी सुरक्षा और स्थिरता भारत की पहली प्राथमिकता है।
भारत की भावी रणनीति
भारतीय कूटनीतिज्ञों के अनुसार, भारत को इस त्रिपक्षीय समझौते से घबराने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन सतर्क रहने की सख्त जरूरत है। भारत को रियाद और आबू धाबी के साथ अपने रणनीतिक साझेदारी परिषद (Strategic Partnership Council) को और सक्रिय करना होगा ताकि पाकिस्तान इस मंच का भारत-विरोधी इस्तेमाल न कर सके।
इतना ही नहीं, भारत को तुर्की के साथ अपने व्यापारिक और आर्थिक संबंधों का संतुलित इस्तेमाल करते हुए भारत को अपनी रक्षा चिंताओं से अंकारा को अवगत कराते रहना होगा। इसके साथ ही पाकिस्तान को मिलने वाली किसी भी आधुनिक विदेशी सैन्य तकनीक का जवाब देने के लिए भारत को अपने रक्षा स्वदेशीकरण और हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी नौसैनिक उपस्थिति को मजबूत बनाए रखना होगा।

