क्या भारत-बांग्लादेश संबंधों में रोड़ा बन रही हैं शेख हसीना?

sheikh hasina and India Bangladesh relations

बांग्लादेश में तख्तापलट के बाद पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को भारत में रहते दो साल हो गए हैं। यही मुद्दा दोनों देशों के आपसी संबंधों की राह में सबसे बड़ा रोड़ा बना हुआ है। शेख हसीना दोनों देशों के लिए बेहद अहम हैं। ALSO READ: पृथ्वी पर ऑक्सीजन की उत्पत्ति की पहेली थोड़ी और सुलझी

 

बांग्लादेश से आकर यहां शरण लेने के ठीक दो साल बाद बुधवार को दिल्ली में फॉरेन कॉरेसपोंडेट्स क्लब के एक कार्यक्रम को वर्चुअल तरीके से संबोधित करने के बाद दोनों देशों के बीच राजनयिक विवाद बढ़ गया है। बांग्लादेश ने इस पर कड़ी नाराजगी जताई है। हालांकि भारतीय विदेश मंत्रालय ने पहले ही साफ कर दिया था कि इस कार्यक्रम से उसका कोई लेना-देना नहीं है।

 

बांग्लादेश की एक अदालत हसीना को दो साल पहले हुए आंदोलन के दौरान बड़े पैमाने पर हुई हिंसा और  हत्या के कथित अपराध में मौत की सजा सुना चुकी है। हसीना पांच अगस्त, 2024 को भारत आ गई थी और उस समय से यहीं रह रही हैं। यहां गोपनीय ठिकाने पर रहते हुए वह कई बार अपने ऑडियो और वीडियो जारी कर चुकी हैं। शेख हसीना ने बांग्लादेश लौटने की भी बात कही है। बांग्लादेश में पहले की अंतरिम सरकार और बीती फरवरी में चुनाव जीतकर सत्ता में आने वाली तारिक रहमान के नेतृत्व वाली बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की गठबंधन सरकार भारत से लगातार इस पर एतराज जताती रही है।

 

भारत-बांग्लादेश के बीच विवाद

बांग्लादेश औपचारिक और अनौपचारिक तरीके से हसीना के प्रत्यर्पण का अनुरोध करता रहा है। केंद्र सरकार ने अब तक इस पर चुप्पी साधे रखी थी। लेकिन इस सप्ताह विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने दिल्ली में पत्रकारों से कहा, “हमें प्रत्यर्पण का अनुरोध मिला है। सरकार इससे जुड़े कानूनी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए इस पर विचार कर रही है।”

 

बांग्लादेश और भारत के बीच वर्ष 2013 में हुए प्रत्यर्पण संधि के एक प्रावधान में कहा गया है कि प्रत्यर्पित किए जाने वाले व्यक्ति के खिलाफ लगाए गए आरोप अगर राजनीतिक प्रकृति के हों तो अनुरोध खारिज किया जा सकता है।

 

अब बुधवार को शेख हसीना के भाषण पर भी बांग्लादेश सरकार ने कड़ी प्रतिक्रिया जताई है। विदेश मंत्रालय की ओर से ढाका में जारी एक बयान में कहा गया है कि सामूहिक हत्या के आरोपी और देश से पलायन करने वाली शेख हसीना को दिल्ली में मीडिया से बात करने की अनुमति दिए जाने पर बांग्लादेश सरकार और आम लोगों में भारी नाराजगी है।

 

सरकार ने कहा कि इस कार्यक्रम से द्विपक्षीय संबंधों में एक नया अध्याय शुरू करने की कोशिशों पर नकारात्मक असर पड़ने की आशंका से भारत सरकार को पहले ही अवगत करा दिया गया था। ढाका ने इसके बावजूद इस कार्यक्रम की अनुमति दिए जाने पर निराशा जताई है। विदेश मंत्रालय ने इसे 'बांग्लादेश की संप्रभुता' और 'जुलाई क्रांति के शहीदों' का घोर अपमान बताया है। ALSO READ: गुलामी की जंजीरों से निकला आइसक्रीम को स्वाद देने वाला वनीला

 

शेख हसीना की अहमियत

भारत और बांग्लादेश दोनों के लिए अलग-अलग वजहों से शेख हसीना की काफी अहमियत है। शेख हसीना के प्रधानमंत्री रहने के दौरान दोनों देशों के आपसी संबंध नई ऊंचाई पर पहुंचे थे। तीस्ता समेत विभिन्न नदियों के पानी के बंटवारे पर विवाद के बावजूद उनके प्रधानमंत्री रहते राजनयिक संबंध बेहतर बने रहे। उनके कार्यकाल में पूर्वोत्तर के उग्रवादी संगठनों के खिलाफ बड़े पैमाने पर कार्रवाई हुई और आखिरकार बांग्लादेश स्थित उग्रवादी शिविरों का सफाया करने में कामयाबी मिली थी।

 

यही वजह है कि भारत पर शेख हसीना का समर्थन करने के आरोप लगते रहे और हसीना पर भारत का पिछलग्गू होने के। तमाम चुनावों में बांग्लादेश के विपक्षी दलों ने इसे अपना प्रमुख मुद्दा बनाया था।

 

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि तमाम आलोचनाओं के बावजूद हसीना ने बांग्लादेश में राजनीतिक स्थिरता का माहौल बनाया। हालांकि कार्यकाल के आखिरी दौर में उन पर राजनीतिक बदले की भावना से काम करने और अपने विरोधियों के खिलाफ ताकत के इस्तेमाल के आरोप भी लगे। जुलाई, 2024 में इन वजहों से ही छात्रों और युवाओं ने उनके खिलाफ बड़े पैमाने पर हिंसक आंदोलन शुरू किया था। शुरुआत में हसीना ने कथित तौर पर बल प्रयोग कर इस दोलन को दबाने की कोशिश की। लेकिन इसका उल्टा असर हुआ। आखिरकार हसीना को वहां से अपनी जान बचा कर भारत में शरण लेनी पड़ी।

 

विश्लेषकों का कहना है कि शेख हसीना और उनके परिवार से भारत का ऐतिहासिक संबंध रहा है। हसीना पहले भी मुसीबत में यहां शरण ले चुकी हैं। ऐसे में दो साल पहले उनका यहां शरण लेना स्वाभाविक ही था। केंद्र में सरकार भले बदल गई हो, नीतियों में खास बदलाव नहीं आया है। ALSO READ: दक्षिण कोरिया में गर्मी ने तोड़ा 100 साल का रिकॉर्ड

 

भारत और बांग्लादेश के बीच प्रत्यर्पण संधि

करीब चार दशक से भारत-बांग्लादेश संबंधों को करीब से देखने वाली विश्लेषक शिखा मुखर्जी डीडब्ल्यू से कहती हैं, “बांग्लादेश के बार-बार एतराज के बावजूद सरकार ने हसीना के भाषणों या बयानों पर कोई रोक नहीं लगाई है। वो लगातार इससे पल्ला झाड़ रहा है।”

 

उनका कहना था कि दोनों देशों के बीच प्रत्यर्पण संधि जरूर है। लेकिन भारत सरकार इस मामले में 'धीरे चलो' की नीति अपना रही है। हसीना के प्रति अपने नरम रवैए के कारण सरकार उनको बांग्लादेश में अनिश्चित भविष्य की ओर धकेलने का फैसला कभी नहीं करेगी।

 

कोलकाता के रबींद्र भारती विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर विश्वनाथ चक्रवर्ती डीडब्ल्यू से कहते हैं, “भारत-बांग्लादेश प्रत्यर्पण संधि में कई ऐसे प्रावधान हैं जिनके सहारे भारत हसीना के प्रत्यर्पण से इंकार कर सकता है या फिर इसे लंबे समय तक लंबित रख सकता है।”

 

उनका कहना था कि अब जब बांग्लादेश की एक अदालत ने हसीना को मौत की सजा सुना दी है, भारत की ओर से प्रत्यर्पण के अनुरोध पर शीघ्र किसी फैसले के आसार नहीं हैं।

 

विश्लेषकों का कहना है कि हसीना भारत के साथ ही बांग्लादेश में सत्ता संभालने वाली तारिक रहमान सरकार के लिए भी महत्वपूर्ण हैं। बीएनपी ने बांग्लादेश में चुनाव के दौरान दो साल पहले हुई हिंसा के दोषियों को कड़ी सजा दिलाने का वादा किया था। अब सरकार के सामने अपने इस वादे को पूरा करने की चुनौती है। ALSO READ: क्या हम फफूंद के खतरे को अब तक कम आंकते रहे हैं?

 

बांग्लादेश की सरकार पर दबाव

राजधानी ढाका में एक वरिष्ठ पत्रकार रियाज अहमद डीडब्ल्यू से कहते हैं, “अवामी लीग पर पाबंदी तो अंतरिम सरकार ने ही लगा दी थी। अब रहमान सरकार ने हसीना समेत कई दोषियों को अदालत से मौत की सजा दिला दी है। ऐसे में उनको बांग्लादेश लाकर सजा दिलाना सरकार के लिए साख का सवाल है।”

 

ढाका में एक सरकारी कालेज में अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विशेषज्ञ ने नाम जाहिर नहीं करने का अनुरोध करते हुए कहा डा। जहीर शेख (बदला हुआ नाम) डीडब्ल्यू से कहते हैं, “बांग्लादेश सरकार अपनी ओर से कोशिश करती जरूर नजर आ रही है। लेकिन वह हसीना के प्रत्यर्पण के लिए भारत पर दबाव डालने की स्थिति में नहीं है।”

 

रियाज और जहीर का कहना था कि बांग्लादेश भले चीन के करीब जा रहा है, वह भारत को नाराज करने का जोखिम नहीं ले सकता। सरकार की साख बचाने के लिए ही बार-बार प्रत्यर्पण का मुद्दा उठाया जा रहा है और हसीना की प्रेस कांफ्रेंस पर आपत्ति जताई जा रही है।

 

विश्लेषकों को उम्मीद है कि शायद अगले महीने दिल्ली में होने वाले ब्रिक्स सम्मेलन के लिए प्रधानमंत्री तारिक रहमान के भारत दौरे में आपसी संबंधों पर जमी बर्फ पिघल सकती है। हालांकि विश्वनाथ चक्रवर्ती कहते हैं कि हसीना का मुद्दा ही इसमें सबसे बड़ा रोड़ा साबित हो सकता है।