जनगणना के नए नियम पर विवाद क्यों

छह साल की देरी से हो रही जनगणना के लिए इसके नियमों में संशोधन किया गया है। केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन आने वाले भारत के महापंजीयक कार्यालय ने जनगणना अधिनियम 1948 की धारा 18 की उपधारा एक के तहत मिली शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए जनगणना नियम 1990 में कुछ और बदलाव करने के लिए निर्देश जारी किए हैं। इनमें प्रस्तावित बदलावों को लेकर कांग्रेस पार्टी ने आपत्ति दर्ज कराई है। कांग्रेस की आपत्तियों पर बात करने से पहले उन दो बदलावों को रेखांकित करने की आवश्यकता है, जो अपनी प्रकृति में बिल्कुल नई हैं। पहला, महापंजीयक कार्यालय ने पहली बार सरकारी स्कूलों व कार्यालयों के कर्मियों के साथ साथ निजी स्कूलों और ट्रस्टों के कर्मियों को भी जनगणना के काम में शामिल करने का प्रस्ताव किया है और दूसरा, किसी सामान्य नागरिक को भी बतौर वॉलंटियर इसमें शामिल करने का प्रस्ताव है। महापंजीयक कार्यालय की ओर से 16 अक्टूबर को जारी अधिसूचना के मुताबिक, ‘ऐसा कोई व्यक्ति, जिसे राज्य सरकार या संघ राज्यक्षेत्र प्रशासन, प्रगणक के रूप में कर्तव्यों का निष्पादन करने के लिए उपयुक्त समझे’ उसे जनगणना के काम में लगाया जा सकता है।

कांग्रेस ने इस प्रस्ताव पर आपत्ति की है। कांग्रेस का कहना है कि राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के लोगों को जनगणना के काम में शामिल करने के लिए यह बदलाव किया जा रहा है। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने दावा किया है कि इस साल 10 से 12 जुलाई को कर्नाटक के बेलगाम में आरएसएस के कार्यकर्ताओं का एक बड़ा प्रशिक्षण शिविर आयोजित किया गया था, जिसका एकमात्र एजेंडा जनगणना 2027 था। उनका कनहा है कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 26 मई 2026 को देश की बदलती डेमोग्राफी पर सुझाव देने के लिए एक उच्चस्तरीय कमेटी का गठन किया था। उस कमेटी में सभी सदस्य आरएसएस हैं और उसके सुझाव पर ही जनगणना के नियमों में बदलाव किया जा रहा है। कांग्रेस को आशंका है कि डेमोग्राफी पर बनी कमेटी और आरएसएस के लोगों को जनगणना में शामिल करके एसआईआर की तरह जनगणना के आंकड़ों में भी खतरनाक तरीके से हेरफेर किया जाएगा। हालांकि खतरनाक रूप से क्या हेराफेरी हो सकती है यह कांग्रेस ने नहीं बताया है। फिर भी कांग्रेस की आशंका को आधारहीन बता कर खारिज नहीं किया जा सकता है। लेकिन सवाल है कि क्या भारत में ऐसी एक व्यवस्था की आवश्यकता नहीं है, जहां वालंटियर्स यानी स्वैच्छिक कार्यकर्ताओं की मदद से जनगणना, मतदाता सूची के पुनरीक्षण, सामाजिक व आर्थिक सर्वेक्षण, नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे जैसे काम कराए जाएं?

ध्यान रहे दुनिया भर के देशों में ऐसी व्यवस्था है। पता नहीं कांग्रेस और दूसरी पार्टियों ने कभी इसका अध्ययन करने का प्रयास किया है या नहीं कि अमेरिका में लगभग पूरा चुनाव वालंटियर्स की देखरेख में होता है। वहां भारत के चुनाव आयोग जैसी कोई केंद्रीय संस्था नहीं है। राज्यों में अपनी अपनी संस्थाएं हैं। लेकिन उनमें भी बहुत लंबी चौड़ी वर्क फोर्स नहीं है और न चुनाव कराने के लिए स्कूलों के शिक्षक व सरकारी कर्मचारियों को बड़े पैमाने पर शामिल किया जाता है। थोड़े से सरकारी कर्मचारी और ढेर सारे वॉलंटियर मिल कर चुनाव कराते हैं। दशकों से ऐसे ही चुनाव होते हैं और डोनाल्ड ट्रंप के आने से पहले किसी ने चुनाव प्रक्रिया में गड़बड़ी के आरोप भी नहीं लगाए थे। भारत में इस तरह की व्यवस्था बनाने की बहुत आवश्यकता है।

भारत में आजादी के बाद से ही तदर्थ प्रक्रिया चल रही है। सरकारी कर्मचारियों को और उसमें भी सरकारी स्कूलों के शिक्षकों को किसी भी तरह की ड्यूटी में लगा दिया जाता है। मतदाता सूची का ‘संक्षिप्त’ या ‘विशेष संक्षिप्त’ या ‘विशेष गहन’ पुनरीक्षण होना है तो सरकारी शिक्षक करेंगे, मतदान कराना है तो सरकारी शिक्षक कराएंगे, मतगणना करनी है तो सरकारी शिक्षक करेंगे, सामाजिक व आर्थिक सर्वे करना हो, नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे करना हो, पशुओं की गिनती करनी हो, टीकाकरण करना हो, कोरोना या बाढ़ जैसी कोई महामारी में राहत बांटना हो, सारे काम सरकारी शिक्षकों को करने होते हैं। कुछ दिन पहले ही एक शिक्षक ने सोशल मीडिया में तंज करते हुए कहा कि वह तो अच्छा है कि सरकार कृषि कार्य नहीं कराती है अन्यथा फसलों की बुवाई, कटाई भी सरकारी स्कूल के शिक्षक करते। सचमुच ऐसी ही स्थिति है। इसका सीधा असर शिक्षा व्यवस्था पर पड़ता है। अभी एसआईआर की प्रक्रिया चल रही है तो राजधानी दिल्ली जैसे राज्य में सैकड़ों स्कूल एक एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं। सरकारी स्कूलों के शिक्षकों से ये सब काम कराने से साल के कई महीने तक पढ़ाई, लिखाई का काम लगभग पूरी तरह से ठप्प रहता है।

सरकार ने अब अनुदान प्राप्त और बिना अनुदान वाले निजी स्कूलों के शिक्षकों को भी इसमें शामिल करने का प्रस्ताव दिया है। इससे वहां भी सरकारी स्कूलों जैसे ही पढ़ाई प्रभावित होगी। ऐसा लग रहा है कि सरकार स्कूली शिक्षा को पूरी तरह से बरबाद करने का संकल्प किए हुए है। वैसे पिछले दिनों आरएसएस से जुड़े रहे एक युवा स्कॉलर के मुंह से सुनने को मिला कि स्कूली शिक्षा को लेकर ‘भाई साहेब’ लोग क्या सोच रहे हैं। एक ‘भाई साहेब’ ने उस युवा स्कॉलर से कहा था कि कॉलेज पहुंचने वाले युवा इतने आंदोलित इसलिए हो रहे हैं क्योंकि देश में आज भी बड़ी संख्या में अच्छे स्कूल चल रहे हैं, जहां से वे पढ़ कर आते हैं। कॉलेज और यूनिवर्सिटीज की पढ़ाई और प्रशासन की व्यवस्था तो पिछले कुछ बरसों में पूरी तरह से बिगाड़ दी गई है। लेकिन चूंकि वे अच्छे स्कूल से आते हैं तो बिगड़े हुई व्यवस्था वाले कॉलेजों में एडजस्ट होने में उनको दिक्कत होती है। सो, इसका उपाय यह है कि स्कूली शिक्षा को भी वैसे ही बरबाद कर दिया जाए जैसे कॉलेज और यूनिवर्सिटीज को किया गया है।

बहरहाल, अगर सरकार गंभीर है तो उसे कांग्रेस की आलोचना की परवाह नहीं करनी चाहिए और देश में ऐसे कामों के लिए वॉलंटियर्स का नेटवर्क तैयार करना चाहिए। इससे देश के युवाओं को सीजनल रोजगार भी मिलेगा और यह बड़ी वर्क फोर्स तैयार होगी। ध्यान रहे देश की आबादी डेढ़ सौ करोड़ है और यहां जनगणना और चुनाव से लेकर अलग अलग तरह के सर्वेक्षण का काम बहुत बड़े पैमाने पर होता है। इसके लिए पढ़े, लिखे बेरोजगार नौजवानों को अगर वालंटियर के तौर पर शामिल किया जाए तो यह योजना ग्रामीण रोजगार की मनरेगा जैसी योजना से बड़ी हो सकती है और इसमें ज्यादा लोगों को रोजगार मिल सकता है। इसके लिए बहुत गहन गंभीर प्रशिक्षण की आवश्यकता भी नहीं होती है। सरकार एक बार प्रशिक्षण की व्यवस्था करके वालंटियर्स की फौज तैयार कर सकती है। यह वर्क फोर्स सरकारी कामकाज तो करेगी ही साथ ही निजी कंपनियों, विज्ञापन एजेंसियों, चुनावी सर्वे करने वाली कंपनियों आदि के लिए भी उपलब्ध रहेगी।

इस मामले में कांग्रेस की आलोचना का कोई खास आधार नहीं है। अगर सरकारी शिक्षक ही जनगणना करेंगे तो क्या गारंटी है कि जयराम रमेश जिस हेरफेर की आशंका जता रहे हैं वह नहीं होगी? आखिर मतदाता सूची का काम तो सरकारी लोग ही कर रहे हैं तो क्या कांग्रेस को उस पर भरोसा है? जयराम रमेश को यह समझना चाहिए सरकारी और निजी शिक्षकों में भी संघ और भाजपा के प्रति रूझान रखने वाले लोग होंगे और कांग्रेस व विपक्ष को पसंद करने वाले भी होंगे। वैसे ही चुनाव कराने या जनगणना के लिए वॉलंटियर नियुक्त होंगे तो उसमें भी हर विचार और राजनीतिक रूझान वाले लोग होंगे। अगर पेशेवर तरीके से कामकाज का वातावरण बनता है, तकनीक का बेहतर इस्तेमाल होता है और निगरानी की ईमानदार व्यवस्था बनती है तो वॉलंटियर वाली व्यवस्था एक साथ भारत की कई समस्याओं का समाधान कर सकती है।

PM मोदी ने दशहरे पर RSS प्रमुख मोहन भागवत के संबोधन की क्‍यों की तारीफ? बोले- आपका बयान प्रेरणादायी है…

PM मोदी ने दशहरे पर RSS प्रमुख मोहन भागवत के संबोधन की क्‍यों की तारीफ? बोले- आपका बयान प्रेरणादायी है...

Why did Prime Minister Narendra Modi praise RSS chief Mohan Bhagwat

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के शताब्दी वर्ष के विजयादशमी उत्सव पर संघ प्रमुख मोहन भागवत के संबोधन की सराहना की। उन्होंने कहा कि भागवत ने राष्ट्रीय प्रगति, सामाजिक एकता, आत्मनिर्भरता और समाज के चरित्र को मजबूत करने जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा की। उन्होंने संघ की 100 साल की यात्रा को सेवा, राष्ट्र निर्माण और सामाजिक सद्भाव का उल्लेखनीय शतक बताया।
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— Narendra Modi (@narendramodi) October 20, 2026
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के शताब्दी वर्ष के विजयादशमी उत्सव पर संघ प्रमुख मोहन भागवत के संबोधन की सराहना की। उन्होंने कहा कि भागवत ने राष्ट्रीय प्रगति, सामाजिक एकता, आत्मनिर्भरता और समाज के चरित्र को मजबूत करने जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा की।

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इससे पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने नागपुर स्थित संघ मुख्यालय में विजयादशमी उत्सव में भाग लिया। मोहन भागवत ने कहा कि भारत में सत्ता परिवर्तन नहीं होगा। उन्होंने व्यवस्था को ख़त्म करने की कोशिश कर रही ताक़तों पर भी निशाना साधा। फ्रांस, अल्बानिया और बांग्लादेश में अशांति का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि आंदोलनों का मक़सद समाधान तलाशना होना चाहिए।

 

आरएसएस प्रमुख ने कहा, यह तूफ़ान पश्चिम से उठा है, जो व्यवस्था के हर स्वरूप के ख़िलाफ़ है। उन्होंने कहा, हमारा देश प्राकृतिक विविधता, धर्मों, जातियों, खानपान और अन्य कई रूपों में विविधता से भरा है, इसलिए हमें ऐसी विचारधारा की ज़रूरत है, जो इन सभी को स्वीकार करे और उनका सम्मान करे। हमारी परंपरा, हमारी सनातन परंपरा, इस विचार को स्वीकार करती है। 

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मोहन भागवत ने कहा कि भारत को तोड़ने की कोशिशें सफल नहीं होंगी। उन्होंने कहा कि यह सोचना ग़लत है कि सत्ता बदलने से परिस्थितियां बदल जाएंगी। उन्होंने कहा, ऐसा पहले कभी नहीं हुआ है और आगे भी ऐसा नहीं होगा।

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के ख़िलाफ़ एसआईआर (स्पेशल इंटेंसिव रिविजन) में कथित अपारदर्शिता को लेकर जारी विरोध प्रदर्शनों के बीच भागवत ने यह भी कहा कि आंदोलनों से बदलाव नहीं आता और समस्याओं का समाधान समाज के भीतर से ही निकलता है।

 

उन्होंने कहा, भारत उनका मुख्य निशाना है, क्योंकि भारत प्रगति कर रहा है। इन ताक़तों को पता है कि पिछले कुछ दशकों में निर्णायक नीतियों के साथ भारत ने जिस तरह आगे बढ़ा है, उसे वे बाधित नहीं कर सकते, इसलिए वे भारत और संघ को तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। भागवत ने आगाह किया कि जब विरोध प्रदर्शन राजनीतिक होते हैं या उन्हें उकसाया जाता है, तो उनका इस्तेमाल तनाव, अराजकता और सार्वजनिक व्यवस्था को बिगाड़ने के लिए किया जाता है।

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया एक्स पर एक पोस्ट में लिखा, नागपुर में शताब्दी वर्ष श्री विजयादशमी उत्सव के दौरान परम पूज्य सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत का अत्यंत प्रेरणादायी संबोधन हुआ। उन्होंने राष्ट्रीय प्रगति, सामाजिक एकता, आत्मनिर्भरता की आवश्यकता और समाज के चरित्र को सुदृढ़ करने जैसे कई महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तार से चर्चा की। विशेष रूप से उल्लेखनीय था उनका वह जोर, जो उन्होंने ‘सेवा’ और ‘राष्ट्र निर्माण’ के प्रति उस प्रतिबद्धता पर दिया, जो हर आरएसएस स्वयंसेवक के जीवन का अभिन्न अंग है।

उन्होंने ‘पंच परिवर्तन’ के बारे में भी बात की और बताया कि किस प्रकार ये सकारात्मक सामाजिक बदलाव लाने में सार्थक योगदान दे सकते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के स्थापना दिवस पर स्वयंसेवकों को बधाई दी। उन्होंने संघ की 100 साल की यात्रा को सेवा, राष्ट्र निर्माण और सामाजिक सद्भाव का उल्लेखनीय शतक बताया।

 

आज विजयादशमी के अवसर पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत कई नेताओं ने देशवासियों को शुभकामनाएं दीं। राष्ट्रपति ने धर्म और न्याय की जीत का संदेश देते हुए विकसित भारत के निर्माण में योगदान देने की अपील की। वहीं प्रधानमंत्री मोदी ने सभी को विजयादशमी की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि उल्लास और विश्वास का यह विजय पर्व हर किसी के संकल्प को नई शक्ति प्रदान करे। सभी का जीवन सुख-सौभाग्य और सफलता से समृद्ध हो, यही कामना है।

अब औपचारिकता भी नहीं?

इलॉन मस्क ने कुछ रोज पहले पूछा था कि क्या मुकेश अंबानी भारत के असली बॉस हैं? अब ऐसा लगता है कि अंदरूनी तौर पर डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन में सचमुच ऐसी राय बनी गई है! 

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो की ताजा भारत यात्रा के सिलसिले में यह उचित सवाल उठा है कि क्या अमेरिका अब भारत के साथ अपने संबंध में कूटनीतिक मर्यादा का पालन करने की जरूरत भी नहीं समझ रहा है। अरबपति अमेरिकी कारोबारी इलॉन मस्क ने कुछ रोज पहले पूछा था कि क्या मुकेश अंबानी भारत के असली बॉस हैं? अब ऐसा लगता है कि अंदरूनी तौर पर ऐसी ही राय डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन में बनी है। इसलिए रुबियो भारतीय कारोबारियों- खासकर रिलायंस ग्रुप के साथ व्यापारिक वार्ता के लिए सीधे मुंबई और जामनगर पहुंच रहे हैं।

इस यात्रा का कार्यक्रम बनने के बाद भारत स्थित अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने “उम्मीद” जताई कि विदेश मंत्री एस. जयशंकर रुबियो से मिलने जाएंगे। बाद में खबर आई कि जयशंकर सचमुच मुंबई जा रहे हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण घटनाक्रम है। यह दिखाता है कि ट्रंप प्रशासन भारत जैसे ‘रणनीतिक सहयोगियों’ को जूनियर पार्टनर के रूप में देखता है और इस पर नरेंद्र मोदी सरकार को कोई एतराज नहीं है! रुबियो की यात्रा का मकसद अमेरिका में रिलायंस ग्रुप के रिफाइनरी लगाने की योजना को आगे बढ़ाना है। ट्रंप प्रशासन दुनिया भर से पूंजी और उत्पादक विशेषज्ञता को जुटाने के प्रयास में लगा है, ताकि अमेरिका में औद्योगिक ढांचा फिर से खड़ा हो सके।

इस क्रम में भारतीय पूंजीपतियों पर उसकी खास निगाह है, जो सहज ही इस योजना में भागीदार बनने को उतावले दिखे हैं। अंबानी, रुइया, अडानी जैसे भारतीय समूह अमेरिका में बड़े निवेश का इरादा दिखा चुके हैं। भारत जैसी विकासशील अर्थव्यवस्था के लिए यह नई चुनौती है, जिसे खुद अभी अपने विकास के लिए बड़े पूंजी निवेश एवं कारोबारी महारत की जरूरत है। हैरतअंगेज है कि पूंजी निवेश की पलट गई इस दिशा पर ना तो भारत में कोई बहस है, और ना ही देश के दीर्घकालिक भविष्य के लिहाज से इसे गंभीरता से लिया जा रहा है। जबकि इस दौर में अमेरिका सहित तमाम देश पूंजी प्रवाह को निर्देशित कर रहे हैं। बहरहाल, सबसे दुखद यह संदेश है कि अमेरिका भारत सरकार की संप्रभु प्रतिष्ठा का भी अब ख्याल नहीं रख रहा है।

गले मिलने का दिखावा और जबकि असल ताकत?

trump and musk

भारत जैसी विश्व व्यवस्था चाहता है, वैसी खुद क्यों नहीं बनाता?…. किसी बड़े नेता तक पहुँच होने से यह पता नहीं चलता कि मुलाकात के बाद कौन-सी शर्तें कायम रहीं। असली परीक्षा तब होती है जब दोनों देशों के हित टकराते हैं। व्यक्तिगत कूटनीति तभी सार्थक होती है जब संस्थाएँ उस पहुँच को स्थायी राष्ट्रीय लाभ में बदल सकें। ऐसा नहीं होने पर गले मिलने की तस्वीर एक ऐसा विज्ञापन बन जाती है जिसके दावों को वास्तविक बातचीत और समझौतों ने अभी साबित नहीं किया है।

पश्चिमी देशों के बुद्धिजीवियों और रणनीतिक विशेषज्ञों की बैठकों में भारत की वैश्विक हैसियत पर अक्सर ऐसे चर्चा होती है, मानो दुनिया की सबसे बड़ी मेज पर उसके लिए कुर्सी रखी जानी बाकी हो। पश्चिम को भारत का महत्व स्वीकार करना चाहिए। उसकी रणनीतिक स्वायत्तता का सम्मान करना चाहिए। ऐसी शर्तें नहीं थोपनी चाहिए जिनसे एक अनिवार्य साझेदार नाराज हो जाए। मान लिया गया है कि दुनिया की बड़ी शक्तियों में भारत का शामिल होना तय है। बस यह फैसला होना बाकी है कि उसे कहाँ बैठाया जाएगा।

इस सोच में दम है। भारत का विशाल बाजार, उसकी भौगोलिक स्थिति, तकनीकी प्रतिभा और सैन्य शक्ति उसे अंतरराष्ट्रीय सौदेबाजी में पर्याप्त ताकत देते हैं। क्वाड के जरिए सहयोग, सेमीकंडक्टर क्षेत्र में निवेश और रक्षा उत्पादन में साझेदारी ऐसे साझा हित हैं जिन्हें कोई गंभीर सरकार नजरअंदाज नहीं कर सकती। पश्चिम के दोहरे मानदंडों पर भारत की आपत्तियाँ भी बेबुनियाद नहीं हैं। जो देश अपनी सुविधा के अनुसार कभी संप्रभुता का सम्मान करते हैं और कभी उसकी अनदेखी, उन्हें दूसरों को सिद्धांतों पर कायम रहने का उपदेश देने का कितना अधिकार है?

लेकिन किसी देश का अनिवार्य होना उसे दबाव से सुरक्षित नहीं बना देता। उसकी उपयोगिता सौदेबाजी में ताकत जरूर देती है, मगर यह गारंटी नहीं कि उस पर दबाव नहीं डाला जाएगा। कोई देश आपकी जरूरतों के कारण आपको गले भी लगा सकता है और आपकी कमजोरियों का फायदा उठाकर दबाव भी बना सकता है। निमंत्रण और शिकंजा, दोनों साथ आ सकते हैं।

यहीं भारत के बढ़ते वैश्विक महत्व की चमकदार कहानी भ्रामक हो जाती है। किसी ताकतवर देश के लिए उपयोगी होना और उस उपयोगिता की शर्तें स्वयं तय करने की ताकत रखना, दो अलग बातें हैं।

इस फर्क को समझने के लिए भारतीय रणनीतिकारों को विदेशों की ओर देखने की जरूरत नहीं है। अपने ही देश की कॉरपोरेट अर्थव्यवस्था में इसका उदाहरण मौजूद है।

मुंबई हवाई अड्डे का नियंत्रण जीवीके समूह से अदाणी समूह के हाथों में जाने की घटना को देखें। जीवीके के पास एक महत्वपूर्ण रणनीतिक संपत्ति थी। हवाई अड्डे के संचालन का अनुभव था। बड़े निवेशकों से संबंध थे। इसके बावजूद कर्ज, वित्तीय कठिनाइयों और जाँच एजेंसियों की कार्रवाइयों का सिलसिला उसके हवाई अड्डा कारोबार के आसपास बना। अंततः अदाणी समूह ने उसका नियंत्रण हासिल कर लिया।

बाद में जीवीके के उपाध्यक्ष ने इस बात से इनकार किया कि किसी दबाव के कारण हवाई अड्डा बेचना पड़ा। उनका यह खंडन भी घटनाक्रम का हिस्सा है। लेकिन उन परिस्थितियों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता जिनके कारण यह सौदा राजनीतिक विवाद का विषय बना। यहाँ मुद्दा सौदे को लेकर किसी एक विवादित दावे को सही या गलत ठहराना नहीं है। बड़ा सवाल यह है कि किसी संपत्ति का मालिक होना कितना मायने रखता है, यदि उसे बनाए रखने के लिए जरूरी पूँजी, पहुँच या अनुमति किसी दूसरे के नियंत्रण में हो?

कंपनी की बैलेंस शीट पर अरबों की संपत्ति दिखाई दे सकती है, जबकि उसके पीछे छिपी निर्भरता नजर नहीं आती। कोई स्थापित कारोबारी तब तक सुरक्षित दिखाई देता है जब तक उसकी सुरक्षा की शर्तें नहीं बदलतीं।

संप्रभु देशों के सामने भी यही समस्या होती है। फर्क इतना है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में इसके परिणाम कहीं अधिक खतरनाक हो सकते हैं। अमेरिका अपने बाजार, तकनीक, वित्तीय व्यवस्था और सुरक्षा संबंधों तक पहुँच के जरिए दूसरे देशों पर दबाव बना सकता है। जरूरी नहीं कि उसका नियंत्रण हर क्षेत्र में हो। दबाव प्रभावी बनाने के लिए इतना पर्याप्त है कि वह ऐसी किसी चीज तक पहुँच रोक सके जिसका विकल्प सामने वाला देश आसानी से नहीं खोज सकता।

भारत के पास भी सौदेबाजी के लिए पर्याप्त संसाधन हैं। मगर असली सवाल यह है कि भारत अपनी किसी महत्वपूर्ण जरूरत की आपूर्ति रुकने पर कितने समय तक टिक सकता है? और दूसरी तरफ, अमेरिका या कोई दूसरा साझेदार भारत से मिलने वाले लाभ के बिना कितने समय तक रह सकता है?

रणनीतिक स्वायत्तता की असली परीक्षा इसी असमान सहनशक्ति में होती है।

इसका अर्थ यह नहीं कि अंतरराष्ट्रीय संबंध किसी गणितीय समीकरण के अनुसार चलते हैं। सरकारें गलत आकलन करती हैं। गठबंधन बदलते हैं। घरेलू विरोध के कारण नेताओं की समझौता करने की क्षमता सीमित होती है। आर्थिक और सैन्य शक्ति के साथ विश्वसनीयता, जनमत और संस्थाओं के प्रति भरोसा भी परिणामों को प्रभावित करते हैं।

बड़ी शक्तियाँ अक्सर दूसरों से सहयोग के बदले उनके व्यवहार में बदलाव की माँग करती हैं। शर्तें लगाती हैं, जबकि अपने ऊपर वैसी ही निगरानी या जवाबदेही स्वीकार नहीं करतीं। उनका पाखंड उन शर्तों को समाप्त नहीं करता। उलटे, निर्भर देश के लिए उनकी कीमत और बढ़ा देता है। इसलिए भारत के सामने दो परस्पर जुड़े काम हैं। पहला, ऐसी क्षमता विकसित करना जिससे वह बाहरी दबाव का सामना कर सके। दूसरा, ऐसी विश्वसनीयता अर्जित करना जिससे दूसरे देश भी उसके साथ खड़े होने को तैयार हों।

इन दोनों का सीधा संबंध भारत की घरेलू शासन व्यवस्था से है। स्वतंत्र नियामक संस्थाएँ हों तो निवेश के लिए राजनीतिक पहुँच पर निर्भरता कम होती है। विश्वसनीय न्यायपालिका हो तो सत्ता के कृपापात्र समूहों से बाहर रहकर कारोबार खड़ा करने का जोखिम घटता है। खुली प्रतिस्पर्धा हो तो देश की उत्पादन क्षमता का आधार व्यापक बनता है। विश्वविद्यालयों में असहमति और स्वतंत्र विचार की गुंजाइश हो तो वह बौद्धिक स्वतंत्रता विकसित होती है जिसके बिना तकनीकी आत्मनिर्भरता संभव नहीं।

यही संस्थाएँ किसी शक्तिशाली साझेदार के शर्तें लगाने पर देश को अधिक विकल्प देती हैं। इनके कमजोर होने पर राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा कुछ कंपनियों, कुछ फैसलों और कुछ व्यक्तियों पर निर्भर होती चली जाती है। मगर नई दिल्ली में भारत की ताकत का सार्वजनिक प्रदर्शन अक्सर व्यक्तिगत कूटनीति के इर्दगिर्द घूमता दिखाई देता है।

प्रधानमंत्री का विदेशी नेताओं से गले मिलना इसकी सबसे पहचानी जाने वाली तस्वीर है। सामने खड़े नेता से आत्मीयता दिखाई जाती है और उस दृश्य को भारत की बढ़ती अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा के प्रमाण के रूप में प्रसारित किया जाता है। गले मिलना आत्मीयता का संकेत हो सकता है। लेकिन उससे वह सब साबित नहीं होता जो तस्वीर देखकर नागरिकों को समझाया जाता है।

किसी बड़े नेता तक पहुँच होने से यह पता नहीं चलता कि मुलाकात के बाद कौन-सी शर्तें कायम रहीं। असली परीक्षा तब होती है जब दोनों देशों के हित टकराते हैं। भारत किस बात से इनकार कर सकता है? क्या हासिल कर सकता है? और मतभेद होने पर संबंध कितना दबाव सह सकता है?

व्यक्तिगत कूटनीति तभी सार्थक होती है जब संस्थाएँ उस पहुँच को स्थायी राष्ट्रीय लाभ में बदल सकें। ऐसा नहीं होने पर गले मिलने की तस्वीर एक ऐसा विज्ञापन बन जाती है जिसके दावों को वास्तविक बातचीत और समझौतों ने अभी साबित नहीं किया है।

भारत की विदेश नीति के प्रचार और वास्तविक आचरण के बीच यह अंतर केवल व्यक्तिगत कूटनीति तक सीमित नहीं है। एक अधिक न्यायपूर्ण विश्व व्यवस्था की भारत की माँग में भी यही सवाल उठता है।

नई दिल्ली का विरोध सही है जब शक्तिशाली देश नियमों को अपनी सुविधा के अनुसार मोड़ते हैं, असहमति जताने वालों को दंडित करते हैं या विशेषाधिकार अपने लिए सुरक्षित रखते हैं। लेकिन जब ऐसे ही सवाल भारत के भीतर उठते हैं तो उसकी दलील का नैतिक वजन कम होने लगता है। मतदाता सूचियों को लेकर विवाद, विपक्षी नेताओं के विरुद्ध जाँच एजेंसियों के चुनिंदा इस्तेमाल के आरोप, निवारक हिरासत और विरोध प्रदर्शनों पर प्रतिबंध जैसे सवाल लोकतांत्रिक विश्वसनीयता से जुड़े हैं। इंटरनेट बंद करने की कार्रवाइयों का लोगों की आजीविका और आवश्यक सेवाओं तक पहुँच पर पड़ने वाला नुकसान भी दस्तावेजों में दर्ज है।

इन सवालों का उत्तर संप्रभुता का हवाला देकर नहीं दिया जा सकता। संप्रभुता तो यह तय करती है कि इनके जवाब देने की जिम्मेदारी किसकी है। ऐसा नहीं कि दूसरे देशों की आलोचना करने से पहले भारत को हर मामले में आदर्श बनना होगा। भारतीय नागरिकों के अधिकारों की परीक्षा लेने का अधिकार वाशिंगटन को नहीं है। लेकिन जो सरकार दुनिया से कहती है कि साझा शक्ति और न्यायपूर्ण व्यवस्था के उसके दृष्टिकोण पर भरोसा किया जाए, उसे यह भी स्वीकार करना होगा कि अपने देश में उसे सौंपी गई सत्ता का इस्तेमाल कैसे होता है, इसकी पड़ताल होगी।

यही कसौटी व्यापार नीति पर भी लागू होती है।

भारत के पास कमजोर आजीविकाओं की रक्षा करने और अपनी औद्योगिक क्षमता विकसित करने के उचित कारण हैं। इन उद्देश्यों के पक्ष में ठोस तर्क दिए जा सकते हैं। लेकिन इनके नाम पर हर व्यापारिक बाधा को जायज नहीं ठहराया जा सकता, जबकि दूसरे देशों की ऐसी ही पाबंदियों को मुक्त और निष्पक्ष व्यापार के विरुद्ध बताया जाए।

एक न्यायसंगत व्यापार नीति को स्पष्ट करना चाहिए कि संरक्षण किसे दिया जा रहा है, उससे कौन-सी नई क्षमता विकसित होगी और कब संरक्षण पाने वाले उद्योगों को खुली प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ेगा। वरना रणनीतिक स्वायत्तता एक भव्य नाम बनकर रह जाएगी, जिसके पीछे राजनीतिक पहुँच रखने वाले कारोबारियों को प्रतिस्पर्धा से बचाने की व्यवस्था चलती रहेगी।

दुनिया में प्रभावशाली भूमिका निभाने का भारत का दावा मजबूत है। लेकिन उसकी वास्तविक उपलब्धि इस पर निर्भर करेगी कि देश की विशाल आबादी और संस्थाएँ मिलकर कितनी व्यापक उत्पादन क्षमता, प्रतिभा और स्वतंत्र शक्ति विकसित करती हैं।

जिस देश में कारोबारी स्थापित कंपनियों को चुनौती दे सकते हों, नागरिक अधिकारियों से सवाल कर सकते हों और संस्थाएँ सत्ता की नाराजगी सह सकती हों, उसके पास कहीं अधिक ताकत होती है। उसकी तुलना में वह देश कमजोर स्थिति में होगा जहाँ अवसर और सफलता का रास्ता सत्ता तक विशेष पहुँच से होकर गुजरता हो।

ऐसी घरेलू शक्ति विकसित हो जाने से अमेरिका का दबाव, चीन की चुनौती या पश्चिम के दोहरे मानदंड समाप्त नहीं हो जाएँगे। लेकिन भारत के पास उनका सामना करने के अधिक विकल्प होंगे। साथ ही एक अलग विश्व व्यवस्था की उसकी माँग उन देशों को भी अधिक विश्वसनीय लगेगी जो स्वयं अपनी स्वतंत्रता और निर्णय लेने की क्षमता बढ़ाना चाहते हैं।

भारत यह तय नहीं कर सकता कि उससे अधिक शक्तिशाली देश उसकी निर्भरताओं की परीक्षा लेंगे या नहीं। लेकिन वह यह जरूर तय कर सकता है कि उसकी अपनी घरेलू व्यवस्था उन निर्भरताओं को बढ़ाएगी या कम करेगी।

कैमरे हटते ही गले मिलना समाप्त हो जाता है। उसके बाद जो बचता है, वही असली ताकत है। भारत अपने बूते क्या बना सकता है, कितना दबाव सह सकता है और जिन नियमों पर दुनिया को चलने की सलाह देता है, उन पर स्वयं कितना भरोसा पैदा कर सकता है।

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Delimitation Bill October 2026

Delimitation Bill October 2026: अक्टूबर के अंत तक परिसीमन बिल आने की चर्चा जोरों पर है। लेकिन केंद्र सरकार के पास अभी संख्या नहीं है। करीब 36 सांसदों की जरूरत है। और यहीं से खेल शुरू होता है। डीएमके अभी भी भाजपा या एनडीए को समर्थन देने के कोई संकेत नहीं दे रही। वाईएसआरसीपी के जगन मोहन रेड्डी के सुर अब साफ भाजपा और एनडीए के खिलाफ हो चुके हैं। बयानबाजी शुरू हो गई है।

 

तमिलनाडु की राजनीति में एक पुरानी गाथा दोहराई जा रही है। डीएमके को कांग्रेस से तकलीफ है। वजह? कांग्रेस ने टीवीके को समर्थन देकर विजय को मुख्यमंत्री बनाने की दिशा में कदम बढ़ाया। डीएमके का पुराना दर्द फिर उभर आया है। ALSO READ: क्या बिना संसद में परिसीमन बिल पास हुए बदल जाएंगी लोकसभा की सीटें? जानिए संविधान का वो नियम जो कोई नहीं बताता

 

60 साल की राजनीति में कांग्रेस के पास कभी-कभी 35 विधायक भी रहे, लेकिन डीएमके ने तमिलनाडु सरकार में कांग्रेस को कभी मंत्री पद नहीं दिया। केंद्र में कांग्रेस का समर्थन किया, लेकिन राज्य में कांग्रेस को मजबूत करने की कोई पहल नहीं की। स्टालिन जरूर राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने की बात करते रहे। ALSO READ: परिसीमन पर तमिलनाडु CM विजय ने PM मोदी को लिखा पत्र, लोकसभा सीटों की संख्या 543 पर स्थायी रूप से तय करने की मांग

मोदी सरकार की राह आसान नहीं

लेकिन, अब तस्वीर बदल रही है। अखिलेश यादव, ममता बनर्जी, तेजस्वी यादव और विजय थलपति सभी राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने की बात कह रहे हैं। विपक्ष में एक नई एकजुटता का स्वर सुनाई दे रहा है। 

 

परिसीमन बिल पर सरकार के पक्ष में अभी नंबर नहीं जुट रहे। करीब 36 सांसदों की कमी है। वाईएसआरसीपी और बीजेडी के विपक्ष के साथ जाने की संभावना बढ़ गई है। जगन के सुर बदल चुके हैं। बीजेडी भी दूरी बना सकती है।

अप्रैल में पास नहीं हो पाया था परिसीमन बिल

उल्लेखनीय है कि अप्रैल 2026 में सरकार द्वारा ‘परिसीमन विधेयक 2026’ और उससे जुड़ा संविधान (131वां संशोधन) विधेयक लोकसभा में पेश किया गया था, लेकिन दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता के कारण यह विधेयक 17 अप्रैल 2026 को लोकसभा में पारित नहीं हो पाया। इस माना जा रहा है कि केंद्र सरकार दक्षिण भारतीय राज्यों की चिंताओं (जैसे सीटों का अनुपात न घटने देने) को ध्यान में रखते हुए एक नया संशोधित ड्राफ्ट तैयार कर रही है। माना जा रहा है कि विशेष सत्र बुलाकर अक्टूबर के अंत में सरकार एक बार फिर इस बिल को पेश कर सकती है।

नवरात्रि पर्व के अवसर पर अहमदाबाद में मैथिली ठाकुर ने जमाया रंग, CM भूपेंद्र पटेल ने दी गायिका को दी शुभकामनाएं

नवरात्रि पर्व के अवसर पर अहमदाबाद में मैथिली ठाकुर ने जमाया रंग, CM भूपेंद्र पटेल ने दी गायिका को दी शुभकामनाएं

अहमदाबाद एयरपोर्ट पर आगमन के बाद मैथिली ठाकुर ने गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल से गर्मजोशी से मुलाकात की। मुख्यमंत्री ने सोशल मीडिया पर मुलाकात की तस्वीरें साझा करते हुए उन्हें हार्दिक शुभकामनाएं दीं और संगीत के साथ-साथ राजनीति में भी उनकी सफल यात्रा की प्रशंसा की।

 

मैथिली ठाकुर ने भी मुख्यमंत्री के सरल और मिलनसार व्यक्तित्व तथा मार्गदर्शन को अपने दिल को छू जाने वाला बताया। उन्होंने अहमदाबाद में शानदार प्रदर्शन करके उपस्थित दर्शकों का मन मोह लिया था। गुजरात के लोगों का अद्भुत उत्साह और प्रेम देखकर उन्होंने सोशल मीडिया पर खुशी व्यक्त करते हुए लिखा था कि ‘आनंद आ गया अहमदाबाद!'”

गुजरात के मुख्यमंत्री ने क्या लिखा?

गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने सोशल मीडिया पर लिखा, “आज अहमदाबाद एयरपोर्ट पर बिहार की सबसे युवा विधायक और देश की लोकप्रिय लोक गायिका मैथिली ठाकुर से गर्मजोशी से मुलाकात हुई।” मिथिला की समृद्ध लोक संस्कृति और भजनों को अपनी सुरीली आवाज से देश-दुनिया में नई पहचान दिलाने वाली मैथिली संगीत के क्षेत्र में अपार सफलता हासिल करने के बाद अब राजनीति के क्षेत्र में भी सफलतापूर्वक प्रवेश कर चुकी हैं, मैं उनके उज्ज्वल और सफल जीवन के लिए हार्दिक शुभकामनाएं देता हूं। 

 

दूसरी ओर, मुख्यमंत्री से मिलने के बाद मैथिली ठाकुर ने कहा कि उनका सरल और स्नेहपूर्ण व्यक्तित्व उनके दिल को छू गया। भाजपा कार्यकर्ता के रूप में उन्हें मुख्यमंत्री के विचारों और अनुभवों को नजदीक से समझने का बेहतरीन अवसर मिला और उनका स्नेह तथा मार्गदर्शन हमेशा प्रेरणादायक रहेगा।

लोक संगीत से लेकर सोशल मीडिया तक की लोकप्रियता

मैथिली ठाकुर की उम्र फिलहाल 26 वर्ष है। 25 जुलाई, 2000 को जन्मी मैथिली ठाकुर भाजपा  की सदस्य हैं और उन्होंने 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में अलिंदगर (मधुबनी) सीट से जीत हासिल करके बिहार की सबसे युवा विधायक बनने का गौरव प्राप्त किया है।

 

अपनी सुरीली आवाज के लिए पहचानी जाने वाली मैथिली पारंपरिक मैथिली, भोजपुरी लोकगीत, छठ गीत, कजरी और शास्त्रीय संगीत प्रस्तुत करती हैं। उन्होंने बहुत कम उम्र में संगीत के रियलिटी शो में हिस्सा लिया था और सोशल मीडिया के माध्यम से देश-दुनिया में अपार लोकप्रियता हासिल की है। वर्ष 2025 में राजनीति में उनके अचानक और सफल प्रवेश के कारण वे विशेष चर्चा में आई हैं।

Top News 20 October: राष्‍ट्रपति और प्रधानमंत्री ने दी देशवासियों को दशहरे की शुभकामनाएं

Top News 20 October: राष्‍ट्रपति और प्रधानमंत्री ने दी देशवासियों को दशहरे की शुभकामनाएं

President Murmu and Prime Minister Modi extended Dussehra greetings to the nation

Top News 20 October: आज विजयादशमी के अवसर पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत कई नेताओं ने देशवासियों को शुभकामनाएं दीं। राष्ट्रपति ने धर्म और न्याय की जीत का संदेश देते हुए विकसित भारत के निर्माण में योगदान देने की अपील की। वहीं प्रधानमंत्री मोदी ने सभी को विजयादशमी की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि उल्लास और विश्वास का यह विजय पर्व हर किसी के संकल्प को नई शक्ति प्रदान करे। सभी का जीवन सुख-सौभाग्य और सफलता से समृद्ध हो, यही कामना है। पल पल की जानकारी… 

RSS प्रमुख मोहन भागवत का विजयादशमी पर संबोधन

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने नागपुर स्थित संघ मुख्यालय में विजयादशमी उत्सव में भाग लिया। मोहन भागवत ने कहा कि भारत में सत्ता परिवर्तन नहीं होगा। उन्होंने व्यवस्था को ख़त्म करने की कोशिश कर रही ताक़तों पर भी निशाना साधा। फ्रांस, अल्बानिया और बांग्लादेश में अशांति का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि आंदोलनों का मक़सद समाधान तलाशना होना चाहिए।

 

आरएसएस प्रमुख ने कहा, यह तूफ़ान पश्चिम से उठा है, जो व्यवस्था के हर स्वरूप के ख़िलाफ़ है। उन्होंने कहा, हमारा देश प्राकृतिक विविधता, धर्मों, जातियों, खानपान और अन्य कई रूपों में विविधता से भरा है, इसलिए हमें ऐसी विचारधारा की ज़रूरत है, जो इन सभी को स्वीकार करे और उनका सम्मान करे। हमारी परंपरा, हमारी सनातन परंपरा, इस विचार को स्वीकार करती है। 

जगह अलग, कहानी वही!

एनडीएमए के भीड़ प्रबंधन संबंधी दिशा-निर्देशों को धार्मिक आयोजनों के कर्ता-धर्ताओं ने शायद पढ़ने की जरूरत भी नहीं समझी है। नतीजतन, हंसी-खुशी के मौकों पर ग़म की कहानियों का लिखा जाना जारी है!

कोलकाता के चोरबागान दुर्गा पंडाल में मची भगदड़ के अगले ही दिन मध्य प्रदेश के ग्वालियर में शीतला माता मंदिर के पास दर्दनाक दुर्घटना हुई। कोलकाता में 19 और ग्वालियर में 15 श्रद्धालुओं की जान गई। हालांकि दो अलग जगहें हैं, दो घटनाएं हैं, और हादसों के शिकार पात्र अलग हैं, लेकिन दोनों दुर्घटनाओं में कई समान बातें हैं। बेशक, एक सड़क हादसा है, दूसरा भीड़ प्रबंधन की विफलता- लेकिन दोनों की जड़ में एक ही सच्चाई छिपी है कि धार्मिक आयोजनों में सुरक्षा को लग्जरी मानने का नजरिया कायम है। ऐसा इसलिए है कि हर साल धार्मिक स्थलों पर ऐसे अनगिनत हादसे होने के बावजूद ना कोई सीख ली जाती है, और ना ही कोई प्रभावी जवाबदेही तय होती है। ग्वालियर में ट्रक उस सड़क पर पहुंच गया जहां “नो एंट्री” थी और दोपहिया वाहनों तक को रोका जा रहा था।

ऐसे में बैरिकेड तोड़ कर ढलान से नीचे उतरते हुए ट्रक ने कैसे श्रद्धालुओं को कुचला, यह रहस्यमय है। पुलिस को मालूम था कि नवरात्रि में भारी भीड़ होगी, फिर भी वह पुख्ता इंतजाम करने में नाकाम रही। राहत कार्य का आलाम यह था कि पीड़ित परिवारों को खुद क्रेन किराए पर लेनी पड़ी, ताकि शव बाहर निकाले जा सकें। उधर कोलकाता के चोरबागान पंडाल में एक ही निकास था, गलियां संकरी थीं, अंदर अंधेरा था, और बारिश की स्थिति में लोगों को नियमित रूप से निकालने की व्यवस्था नहीं थी। आयोजकों की “सुरक्षा” संबंधी घोषणा और सुरक्षा गार्डों की सीटियों ने भगदड़ को और भड़का दिया।

गौरतलब है कि यह कोई अचानक आई आपदा नहीं थी- बीते दिनों ही बैरिकेड कई बार टूट चुके थे, फिर भी अतिरिक्त तैयारियों की जरूरत नहीं समझी गई। हादसों के बाद की कहानी भी घिसीपिटी हैः कुछ पुलिसकर्मियों का निलंबन, आयोजकों की गिरफ्तारी, मुआवजे की घोषणा और जांच आयोग का गठन। जबकि राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने 2014 में ही भीड़ प्रबंधन के दिशा-निर्देश तैयार किए थे। धार्मिक आयोजनों के कर्ता-धर्ताओं ने शायद उसे पढ़ने की जरूरत भी नहीं समझी है। नतीजतन, हंसी-खुशी के मौकों पर ग़म और दर्द की कहानियों का लिखा जाना जारी है!

रांका, सौरव को नहीं मिली जमानत

नई दिल्ली। कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी के मुख्य प्रवक्ता सौरव दास और आशुतोष रांका की विजयादशमी तिहाड़ जेल में ही मनेगी। दोनों को सोमवार को जमानत नहीं मिली। सौरव और रांका को सोमवार को मंदिर मार्ग पुलिस स्टेशन में स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट, एसईएम के सामने पेश किया गया। वहां पुलिस ने दोनों की न्यायिक हिरासत बढ़ाने की मांग की। पुलिस की मांग पर मजिस्ट्रेट ने दोनों को दो दिन और जेल में रखने का आदेश दिया। अब उन्हें बुधवार को फिर पेश किया जाएगा।

गौरतलब है कि दोनों को 13 अक्टूबर को जंतर मंतर पर प्रदर्शन के दौरान हिरासत में लिया गया था। एसईएम कोर्ट ने उन्हें 14 अक्टूबर को पांच दिन की न्यायिक हिरासत में तिहाड़ जेल भेजा था। दोनों को रविवार, 18 अक्टूबर को अदालत में पेश किया जाना था। लेकिन उससे पहले मजिस्ट्रेट ने कहा कि इन दोनों की रिहाई के लिए उनको धमकी भरे मैसेज मिल रहे हैं। सोमवार को भी सुनवाई में ज्यादा समय धमकी भरे मैसेज पर ही चर्चा हुई।

कॉकरोच जनता पार्टी ने आरोप लगाया कि सौरव दास और आशुतोष रांका की रिहाई में जान बूझकर देरी की जा रही है। सीजेपी की कानूनी मामलों की प्रमुख रत्ना सिंह ने कहा, ‘रविवार को जमानत पर सुनवाई के लिए मजिस्ट्रेट और सरकारी वकील दोपहर 12 बजे से इंतजार के बाद शाम करीब साढ़े पांच बजे पहुंचे’। उनका आरोप है कि दोनों नेताओं की रिहाई पर सुनवाई करने की बजाय मजिस्ट्रेट को मिले धमकी भरे संदेश पर चर्चा की गई।

रत्ना सिंह ने सवाल उठाया कि इस तरह के मैसेज का दोनों नेताओं की जमानत से क्या संबंध है? उन्होंने कहा कि सीजेपी ने मैसेज भेजने वाले की पहचान कर उसके खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की, लेकिन उनकी बात नहीं सुनी गई। सीजेपी का यह भी आरोप है कि दोनों नेताओं के जमानतदारों के दस्तावेजों की जांच में देरी की गई। उनके मुताबिक, चार जमानतदारों को साफ वजह बताए बिना खारिज कर दिया गया। जमानत के लिए बैंक की मुहर वाली फिक्स्ड डिपॉजिट रसीद को दोबारा मंजूरी के लिए पेश करने पर भी पार्टी ने सवाल उठाए। उधर सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने सोशल मीडिया पर आरोप लगाया कि दोनों नेताओं को जेल में रखने के लिए जमानत की प्रक्रिया में देरी की जा रही है। पार्टी ने कहा कि वह दोनों की रिहाई के लिए आगे भी कानूनी लड़ाई लड़ेगी।

बॉन्ड भरने के आदेश को नेहा ने चुनौती दी

नई दिल्ली। सीपीआई एमएल के छात्र संगठन आइसा की अध्यक्ष नेहा बोरा ने जमानत देने के लिए बॉन्ड भरने के पुलिस के आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी है। नेहा बोरा शुक्रवार, 16 अक्टूबर को कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क के तिरंगा मार्च में शामिल होने गई थीं, जहां उनको हिरासत में ले लिया गया था। शनिवार की सुबह पांच बजे उनको छोड़ा गया लेकिन उससे पहले उनसे शांति बनाए रखने का एक बॉन्ड भरवाया गया।

गौरतलब है कि इसी तरह के बॉन्ड भर कर 11 अक्टूबर को कॉकरोच जनता पार्टी के अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका हिरासत से छूटे थे। इन तीनों को 10 अक्टूबर को इंदिरा गांधी अतंरराष्ट्रीय हवाईअड्डे से हिरासत में लिया गया था। बाद में बॉन्ड की शर्तों के उल्लंघन के मामले में सौरव दास और आशुतोष रांका फिर से हिरासत में लिए गए। दोनों छह दिन से जेल में बंद हैं।

बहरहाल, नेहा बोरा ने बॉन्ड भरवाने की पुलिस की कार्रवाई को चुनौती दी है। बताया जा रहा है कि वे हाई कोर्ट में इस मामले में जल्दी सुनवाई की अपील कर सकती हैं। परंतु दशहरा की वजह से इस हफ्ते हाई कोर्ट में छुट्टी है। पुलिस के बॉन्ड को चुनौती देने के लिए वे सोमवार को अदालत पहुंचीं।