अमेरिका-ईरान डील मानने से इजराइल का साफ इनकार, 300 अरब डॉलर के फंड पर ट्रंप के बयान से मचा बवाल

US Iran peace deal

US Iran Peace Deal : अमेरिका और ईरान में भले ही एमओयू पर हस्ताक्षर हो गए हो लेकिन डील पर अमेरिकी राष्‍ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की राह आसान नहीं है। अमेरिका और ईरान अभी भी एक दूसरे को धमकी देने से बाज नहीं आ रहे हैं। इधर लेबनान और ईरान को लेकर इजराइल के तेवर अभी भी तल्ख बने हुए हैं। ALSO READ: 4 महीने के युद्ध को खत्म करने पर सहमत अमेरिका-ईरान, ट्रंप, जेडी वेंस और ईरानी संसद अध्यक्ष ने MoU पर किए हस्ताक्षर

 

नेतन्याहू की नाराजगी

अमेरिका-ईरान से बीच हुई डील से इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू बहुत नाराज हैं। उन्होंने कहा कि इस मामले में मेरी और ट्रंप की राय एक जैसी नहीं। ईरान और उसके सहयोगियों के खिलाफ इजराइल का अभियान अभी खत्म नहीं हुआ है। उन्होंने साफ कहा कि समझौता हो या न हो, ईरान के पास परमाणु हथियार नहीं होंगे। उन्होंने लेबनान के बारे में कहा कि जब तक आवश्यक होगा, हम बफर जोन में बने रहेंगे। हम हमलों को रोकने के लिए कार्रवाई की अपनी स्वतंत्रता बनाए रखेंगे।

 

इजराइल ने अमेरिका और ईरान के बीच होने वाले शांति समझौते को मानने से इनकार कर दिया है। रक्षा मंत्री इजराइल काट्ज ने भी कहा है कि, उनकी सेना दक्षिणी लेबनान से पीछे नहीं हटेगी। लेबनान, सीरिया और गाजा में बनाए गए सिक्योरिटी जोन में इजराइली सेना अनिश्चितकाल तक तैनात रहेगी।

 

300 अरब डॉलर पर बवाल

अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित शांति समझौते को लेकर नए दावे सामने आए हैं। रिपोर्टों के मुताबिक अंतिम वार्ता शुरू होने से पहले अमेरिका ईरान की 24 अरब डॉलर की फ्रीज (जमा) संपत्तियों को चरणबद्ध तरीके से जारी कर सकता है। उसे 300 अरब डॉलर के रिकंस्ट्रक्शन फंड की भी उम्मीद है। हालांकि अमेरिकी राष्‍ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि इस समझौते के तहत किसी भी प्रकार का धन हस्तांतरण नहीं होगा। ALSO READ: US Iran Peace Deal : ईरान का दावा- 24 अरब डॉलर की संपत्ति होगी जारी, ट्रंप बोले- नहीं देंगे, क्या हो पाएगा समझौता

 

यूरेनियम संवर्धन और परमाणु कार्यक्रम पर गहरा मतभेद

 

ट्रंप प्रशासन की सबसे बड़ी 'रेड लाइन' यह है कि ईरान किसी भी कीमत पर परमाणु हथियार न बना पाए। अमेरिका का कहना है कि ईरान अपना परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह बंद करे और अपने संवर्धित यूरेनियम का बड़ा हिस्सा बाहर भेजे। ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को संप्रभुता का मुद्दा मानता है और वह इस पर पूरी तरह सरेंडर करने को तैयार नहीं है। दोनों देशों के बीच इस तकनीकी और राजनीतिक अंतर को पाटना 60 दिनों की तय बातचीत की समयसीमा में बेहद मुश्किल है।

 

भरोसे की कमी

अमेरिका और ईरान दोनों ही पक्षों में के प्रति भरोसे की भारी कमी है। अमेरिकी प्रशासन पर ईरान के प्रति किसी भी तरह की ढिलाई न बरतने का भारी राजनीतिक दबाव है। दूसरी तरफ ईरान के कट्टरपंथियों में इस बात को लेकर भारी नाराजगी है कि सरकार अमेरिका की शर्तों के आगे झुक रही है। 2018 में जब अमेरिका पिछले परमाणु समझौते (JCPOA) से एकतरफा बाहर हो गया था, तब से ईरान अमेरिका के वादों पर आसानी से भरोसा करने को तैयार नहीं है।

edited by : Nrapendra Gupta