June 18, Rani Lakshmibai Sacrifice Day: भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जो साहस, देशभक्ति और बलिदान के प्रतीक बन चुके हैं। उनमें सबसे प्रमुख नाम है रानी लक्ष्मीबाई। हर वर्ष 18 जून को रानी लक्ष्मीबाई का बलिदान दिवस मनाया जाता है। यह दिन उस अदम्य साहस और वीरता की याद दिलाता है, जब एक युवा रानी ने अंग्रेजी हुकूमत के सामने झुकने के बजाय मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान दे दिया।
हर साल 18 जून को उनकी पुण्यतिथि को शहीदी दिवस के रूप में मनाया जाता है, जो हमें याद दिलाता है कि कैसे एक 29 वर्ष की युवा वीरांगना ने दुनिया की सबसे बड़े ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी थी।
1. 'मनु' से 'लक्ष्मीबाई' बनने का सफर
2. वह मोड़ जिसने इतिहास बदल दिया: 'डॉकट्रिन ऑफ लैप्स'
3. 1857 की क्रांति और झांसी का युद्ध
4. अंतिम लड़ाई और 18 जून का सर्वोच्च बलिदान
5. युद्ध के अंतिम क्षणों की घटना
6. अंग्रेजों ने भी माना उनकी वीरता का लोहा
आइए जानते हैं मणिकर्णिका के 'झांसी की रानी' बनने और देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देने की पूरी कहानी:
1. 'मनु' से 'लक्ष्मीबाई' बनने का सफर
रानी लक्ष्मीबाई का जन्म 19 नवंबर 1828 को वाराणसी में एक मराठी परिवार में हुआ था। उनके बचपन का नाम मणिकर्णिका था और प्यार से लोग उन्हें 'मनु' बुलाते थे। बहुत कम उम्र में मां के निधन के बाद, उनके पिता मोरोपंत तांबे उन्हें बिठूर में पेशवा बाजीराव द्वितीय के दरबार में ले आए। वहां मणिकर्णिका की प्रतिभा को देखकर उन्हें 'छबीली' नाम मिला। उस दौर में जहां लड़कियों को घर की दहलीज में रखा जाता था, मनु ने नाना साहब और तात्या टोपे जैसे योद्धाओं के साथ युद्ध कौशल की शिक्षा ली, जिसमें उन्होंने घुड़सवारी, तलवारबाजी, तीरंदाजी और मल्लखंभ सीखा। साल 1842 में उनका विवाह झांसी के महाराजा गंगाधर राव नेवलकर से हुआ, जिसके बाद वे झांसी की रानी लक्ष्मीबाई बनीं।
2. वह मोड़ जिसने इतिहास बदल दिया: 'डॉकट्रिन ऑफ लैप्स'
साल 1851 में रानी ने एक बेटे को जन्म दिया, लेकिन मात्र चार महीने की उम्र में उस बालक का निधन हो गया। राजा गंगाधर राव इस सदमे को बर्दाश्त नहीं कर पाए। स्वास्थ्य बिगड़ता देख, राजा ने अपनी मृत्यु से पहले एक दूर के रिश्तेदार के बच्चे को गोद लिया, जिसका नाम दामोदर राव रखा गया।
1853 में राजा के निधन के बाद, क्रूर ब्रिटिश गवर्नर-जनरल लॉर्ड डलहौजी ने अपनी 'हड़प नीति' (Doctrine of Lapse) के तहत दामोदर राव को झांसी का उत्तराधिकारी मानने से इनकार कर दिया और झांसी को ब्रिटिश साम्राज्य में मिलाने का ऐलान कर दिया। तब महलों में रहने वाली रानी गर्ज उठीं:
'मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी!'
3. 1857 की क्रांति और झांसी का युद्ध
जब 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम भड़का, तो रानी लक्ष्मीबाई मध्य भारत में विद्रोह का मुख्य चेहरा बन गईं। उन्होंने न केवल पुरुषों की बल्कि महिलाओं की भी एक फौज तैयार की, जिसमें उनकी हमशक्ल झलकारी बाई भी शामिल थीं।
झांसी की घेराबंदी (मार्च 1858): ब्रिटिश जनरल ह्यूरोज ने एक विशाल सेना के साथ झांसी के किले को घेर लिया। दो हफ़्तों तक रानी और उनकी सेना ने अंग्रेजों का डटकर मुकाबला किया।
किले से हैरतअंगेज फरारी: जब अंग्रेजों ने गद्दारों की मदद से किले के एक फाटक को खोल दिया और झांसी का पतन तय दिखने लगा, तब रानी लक्ष्मीबाई ने अपने 12 साल के दत्तक पुत्र दामोदर राव को अपनी पीठ पर बांधा और अपने वफादार घोड़े 'बादल' पर सवार होकर किले की ऊंची दीवार से छलांग लगा दी।
4. अंतिम लड़ाई और 18 जून का सर्वोच्च बलिदान
झांसी से बचकर रानी कालपी पहुंचीं और फिर तात्या टोपे के साथ मिलकर उन्होंने ग्वालियर के किले पर कब्जा कर लिया। अंग्रेज इस बात से पूरी तरह बौखला गए थे। जनरल ह्यूरोज ने ग्वालियर को चारों तरफ से घेर लिया। 17-18 जून 1858 कोटा की सराय, ग्वालियर में उस वक्त रानी लक्ष्मीबाई ने पुरुषों के सैनिक वस्त्र पहने थे और दोनों हाथों में तलवार लिए वे अंग्रेजों पर बिजली बनकर टूट पड़ीं। उन्होंने सैकड़ों अंग्रेज सैनिकों को गाजर-मूली की तरह काट डाला।
5. युद्ध के अंतिम क्षणों की घटना:
उनका नियमित वफादार घोड़ा घायल हो चुका था, इसलिए वे एक नए घोड़े पर सवार थीं। सामने एक बरसाती नाला आ गया। नया घोड़ा चौंक गया और उसने नाला पार करने से इनकार कर दिया। वह वहीं गोल-गोल घूमने लगा। रानी समझ गईं कि वे घिर चुकी हैं, फिर भी उन्होंने आत्मसमर्पण करने के बजाय लड़ना जारी रखा। पीछे से एक अंग्रेज सैनिक ने उनके सिर पर तलवार से जोरदार वार किया और एक गोली उनके सीने में लगी। बदहवास हालत में भी वे अंग्रेजों के हाथ नहीं आईं। उनके वफादार सैनिक उन्हें पास के गंगादास साधु की कुटिया में ले गए।
दम तोड़ने से पहले रानी की केवल एक ही अंतिम इच्छा थी- 'मेरा शव अंग्रेजों के हाथ नहीं लगना चाहिए।' साधु और उनके सैनिकों ने तुरंत कुटिया की लकड़ियों से ही उनकी चिता बनाई और उन्हें मुखाग्नि दे दी। इस तरह 18 जून 1858 को भारत की यह महान बेटी इतिहास में अमर हो गई।
6. अंग्रेजों ने भी माना उनकी वीरता का लोहा
रानी लक्ष्मीबाई की वीरता का प्रभाव ऐसा था कि उनका सबसे बड़ा दुश्मन, ब्रिटिश जनरल ह्यूरोज, जिसने उन्हें हराया था, उसने अपनी आधिकारिक युद्ध रिपोर्ट में लिखा था:
'यहां वह महिला सोई हुई है, जो विद्रोही नेताओं में एकमात्र 'मर्द' (सबसे अधिक वीर) थी।'
सुभद्रा कुमारी चौहान की वे पंक्तियां आज भी हर भारतीय की रगों में देशभक्ति का संचार कर देती हैं:
'बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी॥'
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