‘तुम एक पंछी हो, लेकिन अभी दुख और पीड़ा के एक पिंजड़े में कैद हो। इस पिंजड़े से अब तुम्हारे उड़ने का समय आ गया है।’ यह ब्रह्मकुमारी लवली के शब्द हैं, जो उन्होंने गाजियाबाद में हरीश राणा को अंतिम विदाई देते वक्त कहे थे। हरीश 13 साल से कोमा में हैं। सुप्रीम कोर्ट से परमीशन मिलने बाद दिल्ली एम्स में उन्हें इच्छामृत्यु दी जा रही है। हरीश से ऑक्सीजन सपोर्ट हटा लिया गया है। खानी-पानी भी पिछले 2 दिन से बंद है। पहले ट्यूब के सहारे खाना दिया जा रहा था। एम्स में डॉक्टरों की टीम हरीश की पल-पल की मॉनिटरिंग कर रही है। मां और पिता अस्पताल में वार्ड के एक कमरे में भगवान से यही प्रार्थना कर रहे हैं कि बिना किसी दर्द के बेटा भगवान के पास चला जाए। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने मां-बाप की याचिका पर हरीश को इच्छामृत्यु की इजाजत दी थी। 14 मार्च को हरीश को गाजियाबाद के राजनगर स्थित राज एंपायर सोसायटी स्थित घर से दिल्ली एम्स शिफ्ट किया जा चुका है। तब ब्रह्माकुमारी बहन लवली ने परिवार के साथ हरीश को विदाई दी थी। उन्होंने बताया, पिता अशोक राणा इच्छामृत्यु के लिए तैयार नहीं थे। मगर, हरीश की मां निर्मला ने कहा- दीदी हम बेटे के लिए इच्छामृत्यु चाहते हैं। हरीश के पिता बेटे की इच्छामृत्यु के लिए कैसे माने? ब्रह्मकुमारी लवली का हरीश के परिवार से कब से संबंध हैं? वह परिवार से कब और कैसे जुड़ीं? पढ़िए रिपोर्ट… 4 साल पहले हरीश की मां ने जताई थी इच्छामृत्यु की इच्छा
लवली बहन ने बताया, हरीश का परिवार 18 साल से प्रजापिता ब्रह्मकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय से जुड़ा हुआ था। 5 साल पहले हरीश का परिवार राजनगर एक्सटेंशन स्थित मेरे केंद्र पर आया था। वह हर दिन यहां एक घंटे की क्लास लेते। तब से हम लोग भी परिवार से जुड़ गए। 4 साल पहले एक दिन अशोक राणा ने क्लास में मुझसे कहा, दीदी आपको मेरे घर चलना है। हरीश की मम्मी आपसे कुछ कहना चाहती हैं। मैं घर गई। निर्मला ने बेटे के बारे में बताया। उसे दिखाया। मैंने देखा, हरीश की आंखें खुली रहती थीं। मुंह भी खुला रहता था। वह शांत पड़ा रहता था। निर्मला ने मुझसे कहा, अब बेटे का दर्द देखा नहीं जाता। मैं चाहती हूं कि इसे इच्छामृत्यु मिल जाए। मगर, हरीश के पिता इसके लिए तैयार नहीं हैं। उन्हें समझाइए। वह कहते थे कि यह नेचुरल नहीं है। मैं नेचुरल मौत चाहता हूं। तब मैंने हरीश के पिता, बहन को इच्छामृत्यु के लिए तैयार किया। फिर हरीश के माता-पिता कोर्ट गए। पूरा परिवार साथ था। फिर मामला हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट पहंचा। लवली बहन बोलीं- हरीश के कर्म कट गए, वह एक ब्रह्मचारी है
ब्रह्मकुमारी लवली कहती हैं, मैंने देखा कि हरीश की मां निर्मला और पिता अशोक राणा हर दिन यही प्रार्थना करते थे कि एक न एक दिन उनका बेटा हरीश ठीक हो जाएगा। 13 साल बीत गए। मगर हरीश में कोई सुधार नहीं हुआ। जब हरीश को एम्स में शिफ्ट होने की प्रक्रिया शुरू हुई, तब मैं उसे अंतिम विदाई देने पहुंची थी। कोमा में होते हुए भी उसकी आंखे खुली थीं। वह एक माहत्मा है। उसके कर्म कट चुके हैं। उसकी आत्मा बहुत लाइट है। वह एक ब्रह्मचारी है। वह जाग भी जाता था। खांसता भी था। लेकिन बाकी शरीर के किसी अंगों में मूवमेंट नहीं था। शरीर कंकाल हो चुका था। हाथ-पैरों और शरीर की हड्डी भी बाहर आने लगीं थीं। मां, पिता और छोटा भाई आशीष चेयर पर भी बैठाता था। पूरी देखरेख करते थे। परिवार के सभी सदस्य सेवा करते थे। घर से AIIMS ले जाने से पहले का वीडियो सामने आया था
जब 14 मार्च को हरीश को घर से AIIMS ले जाया जा रहा था, उस दिन उसके घर ब्रह्मकुमारी आश्रम की दीदी लवली पहुंची थीं। उन्होंने हरीश के माथे पर चंदन का टीका लगाया था। उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा था- सबको माफ करते हुए और सबसे माफी मांगते हुए अब जाओ…ठीक है। इस दौरान हरीश के परिवार के सभी सदस्यों की आंखें नम हो गई थीं। पिता अशोक ने परिवार के सभी सदस्यों से माफी मांगी थी। कहा था कि न चाहते हुए भी यह कदम उठाना पड़ा। करीब 6 साल पहले हरीश का पूरा परिवार गाजियाबाद शिफ्ट हुआ था। इससे पहले 13 साल तक हरीश राणा के पिता अशोक राणा दिल्ली रहे। ‘सुप्रीम कोर्ट ने मंजूरी देकर हरीश पर बड़ा उपकार किया’ राणा परिवार ने कहा था कि हाईकोर्ट ने तो हमारी याचिका खारिज कर दी थी। लेकिन, सुप्रीम कोर्ट ने मंजूरी देकर हरीश पर बड़ा उपकार किया। हमसे उसकी पीड़ा देखी नहीं जा रही थी। बेबसी ये है कि वह बता भी नहीं पाता कि उसे कहां-क्या तकलीफ है? हम तो इसे पैसिव यूथेनेशिया भी नहीं बोलना चाहते। हम इसे भगवान की गोद में छोड़ रहे हैं। जब हरीश प्राण त्याग देगा तो बहुत सम्मान से घर लाएंगे और उसे अंतिम विदाई देंगे। परिवार और सोसाइटी में खामोशी छाई
हरीश के दिल्ली AIIMS में शिफ्ट होने के बाद से परिवार में खामोशी है। पिता भी किसी से मिल नहीं रह रहे। सोसाइटी के लोग बताते हैं कि वह भावुक हैं। बहन और मां दिल्ली AIIMS से लौटने के बाद भी रोए। मां निर्मला ने कहा था कि जिसे जन्म दिया, पाल-पोसकर बड़ा किया। फिर से अबोध की तरह उसकी देखभाल की। दुख तो बस इस बात का रहा कि उसने तो अपनी पीड़ा भी नहीं बताई। सुबह-शाम जब उसकी मालिश करती, तो मैं उसे घर के किस्से सुनाती थी कि आज क्या-क्या हुआ? कई बार घंटों तक इंतजार करती कि एक बार बस पलक झपक जाए। जिससे मुझे लगे कि उसने सब सुन लिया। कभी उबासी लेता, कभी छींक आती या आंखों के आसपास की त्वचा फड़कती तो हमें उसके जिंदा होने का सुकून होता था। हरीश इस हाल में कैसे पहुंचे, वजह जानिए…
दिल्ली में जन्मे हरीश राणा चंडीगढ़ की पंजाब यूनिवर्सिटी से बीटेक कर रहे थे। साल 2013 में आखिरी सेमेस्टर की पढ़ाई के दौरान वह हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिर गए थे। हादसे के बाद उनके पूरे शरीर में लकवा मार गया और कोमा में चले गए थे। तब से न वह बोल पा रहे और न ही किसी चीज को महसूस कर पा रहे। डॉक्टरों ने हरीश को क्वाड्रिप्लेजिया नाम की गंभीर बीमारी से पीड़ित बताया है। इस स्थिति में मरीज फीडिंग ट्यूब (खाने-पीने की नली) और वेंटिलेटर के सहारे जिंदा रहता है। डॉक्टरों के मुताबिक, इसमें ठीक होने की संभावना लगभग नहीं के बराबर होती है। पिछले 13 साल से लगातार बिस्तर पर पड़े रहने की वजह से हरीश के शरीर पर बेडशोल (गहरे घाव) भी हो गए हैं। समय के साथ उनकी हालत और ज्यादा बिगड़ती जा रही। परिवार के लिए उन्हें ऐसे देखना मानसिक रूप से बेहद कठिन हो गया है। ———————– यह खबर भी पढ़ें… सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार इच्छामृत्यु की इजाजत दी, 13 साल से कोमा में है बेटा, माता-पिता ने लगाई थी गुहार सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को इच्छामृत्यु मामले में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया। कोर्ट ने 13 साल से कोमा में रह रहे 31 साल के युवक हरीश राणा को इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) की मंजूरी दे दी। गाजियाबाद के रहने वाले हरीश लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर हैं। देश में इस तरह का यह पहला मामला है। पूरी खबर पढ़ें
